भोपाल,9 दिसंबर. लोक सेवाएँ दिये जाने की समूची प्रक्रिया को मजबूत करने और इसमें जवाबदेही सुनिश्चित किये जाने को लेकर राजधानी में हुआ दो-दिनी विमर्श आज संपन्न हो गया. राज्य सरकार लोक-सेवा गारंटी कानून पर लोगों की अपेक्षाओं और भावनाओं के अनुरूप अमल करना चाहती हैं.

इसलिए विषय-विशेषज्ञों के साथ मश्विरे और उनके सुझाव, सिफारिशें जानने तथा उन्हें उपयुक्त होने पर अपनाने के सभी विकल्प और रास्ते सरकार ने खोल रखे हैं. इसी मकसद से 12 राज्यों के प्रशासनिक अफसरों, स्वयंसेवी संगठनों और विशेषज्ञों की राय जानने के उद्देश्य से यह विमर्श किया गया. सरकारी औपचारिकता बन कर न रहे कानून-इस मौके पर जुटे विशेषज्ञों का मानना था कि लोगों को समय पर सरकारी सेवाएँ लेने का जो हक इस कानून के जरिए दिया गया है, उसके प्रति महज सरकारी कार्यक्रम होने का अहसास नहीं होना चाहिए. इसलिए ”सरकार मेरी माई-बाप” की धारणा से परे ‘तत्काल-सेवा’ पाने के लिए एक टोकन शुल्क लिया जाना जरूरी है. ऐसी ये सेवाएँ बिल्कुल मुफ्त और जल्द मिल जाने से लोगों में अपनी जिम्मेदारियों से बेफिक्र होने की प्रवृत्ति उपजेगी और आगे लम्बे समय में ऐसे इंतजाम औपचारिक बनकर रह जाने का अंदेशा भी रहेगा.

विशेषज्ञों का यह भी कहना था कि टोकन शुल्क के रूप में मिलने वाले राजस्व से लोक-सेवा केन्द्रों के संचालन और इस क्षेत्र से जुड़ी अन्य व्यवस्थाएँ करने में मदद मिल जायेगी. यह सिफारिश क्षमता-संवर्द्धन और इसकी चुनौतियों पर चर्चा के लिए बनाए गए समूह ने दी. जुर्माने के साथ इनाम भी जरूरी-विशेषज्ञों की एक अन्य सिफारिश यह थी कि समय पर सेवाएँ न देने वाले कर्मचारी पर जुर्माने के साथ ही इस कानून में अच्छे काम करने वालों के लिए इनाम का प्रावधान भी होना चाहिए. सिर्फ जुर्माने के जरिए सरकारी अमले में एक भयपूर्ण वातावरण का निर्माण होने से उसकी कार्य-क्षमता बिगड़ेगी. इसी तरह इनाम के जरिए उसमें स्व-प्रेरणा और खुशी से काम करने की भावना प्रबल होगी. यह सिफारिश भी क्षमता-संवर्द्धन समूह की चर्चाओं से उपज कर सामने आई.

जुर्माने का अन्य विकल्प तलाशना जरूरी-बतौर विशेषज्ञों के एक समूह ने कानून के तहत सजा के लिए किये गये जुर्माने के अन्य विकल्प तलाशने का सुझाव दिया. फिलहाल यह जुर्माना वेतन से विलंब किए गए दिनों के हिसाब से कटता है. उनका कहना था कि व्यावहारिकता के धरातल पर एक टोकन जुर्माना तय कर दोषी कर्मचारी से वसूला जा सकता है. समूह की राय यह भी थी कि जुर्माने के साथ ही संबंधित आवेदक को सेवा की सुपुर्दगी भी सुनिश्चित होनी चाहिए. यह सुझाव कानून के संवैधानिक ढाँचे में सुधार पर चर्चा के लिये गठित समूह ने व्यक्त किया था. ऑफ-लाइन आवेदन लेना जरूरी है- अभी विशेषज्ञों का सुझाव था कि जिस उपयुक्त सॉफ्टवेयर के निर्माण का जिम्मा उठाया गया है, उस प्रक्रिया में अभी करीब 3 साल का वक्त लगेगा और तब तक ऑफ-लाइन सुविधा को जारी रखना उचित होगा. विशेषज्ञों ने इस सॉफ्टवेयर को आम लोगों की आसान समझ के मुताबिक, पारदर्शी और तत्काल प्रिंट-आउट देने लायक बनाए जाने का सुझाव दिया. इसी तरह कॉल-सेंटर खोले जाने, आवेदक को सिर्फ एक बार इन सेंटरों पर बुलवाने, लोक-सेवा प्रदाय के लिए अलग बजट आवंटन करने, कर्मचारियों में समर्पणपूर्ण भावना निर्मित करने, नियमों की अनिवार्यता तय करने का अधिकार राज्य सरकार को होने, सेवाएँ प्रदान करने की अवधि व्यावहारिकता के धरातल पर और उपयुक्तता के आधार पर तय हो, कानून पर अमल के अधिकारों का विकेन्द्रीकरण जिला और स्थानीय निकायों तक किये जाने आदि के सुझाव भी विशेषज्ञों ने दिए.

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