पेट्रोल के दाम बढ़े भी हैं और घटने भी जा रहे हैं लेकिन घटने के बाद भी बढ़े ही रहेंगे. लोगों को इस ड्रामेबाजी से बढ़े भावों पर लाया जा रहा है. कल केंद्रीय मंत्रियों के समूह (जीओएम) की बैठक हो रही है. जो दोनों काम करेगी. पेट्रोल के दाम जो कम्पनियों ने 7.50 रुपये बढ़ाए हैं उन्हें ढाई रुपये कम किया जाएगा. इसके अर्थ होंगे कि भाव 5 रुपये तो बढ़े ही रहेंगे. इसके साथ ही मंत्रियों का समूह डीजल पर 5 रुपये बढ़ा सकता है और रसोई गैस भी लगभग 20 रुपये बढ़कर 400 रुपये प्रति सिलेंडर तक जा सकती है.

पेट्रोल की कीमतों पर से सरकार मूल्य नियंत्रण पहले ही खत्म कर चुकी है इसलिए हमेशा की तरह इस बार भी केंद्रीय वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने फिर यही कहा कि पेट्रोल के भाव सरकार नहीं बढ़ाती बल्कि पेट्रो कम्पनियां बढ़ाती हैं. यह काम वे अपने नफा नुकसान के आधार पर करते हैं. तब कंपनियों को इसे बढ़ाने में इस बात का क्यों इंतजार करना पड़ा कि संसद का बजट सत्र खत्म हो तभी भाव बढ़ाए जायेंगे. डीजल और रसोई गैस पर सरकार का मूल्य नियंत्रण जारी है. इसलिए आज (25 मई) को मंत्री समूह इन दोनों के दाम बढ़ा देगा. सरकार सिर्फ यह वाहवाही चाहती है कि उसने पेट्रोल के दाम 2.50 रुपये कम कर दिये. जब भाव 5 रुपये बढ़े ही रहेंगे तब वाहवाही क्या भाव बढऩे की दी जाये.

लेकिन यह भी एक आर्थिक यथार्थ है कि डालर का मूल्य रुपये के मुकाबले बढ़ जाने से अंतरराष्टï्रीय आर्थिक जगत डांवाडोल हो गया. अरब राष्टï्र अपनी मुद्रा रियाल, दीनार में पेट्रो क्रूड नहीं बेचते हैं बल्कि अमेरिकी डालर में व्यापार करते हैं. तेल उत्पादक अरब राष्टï्रों का दूसरे देश की मुद्रा में अपना व्यापार करने का यह बड़ा ही अजीब तरीका है. आज इरान को उसी का दुष्परिणाम भुगतना पड़ रहा है. अमेरिकी तेल नाकाबंदी की मजबूरी में है. उसने भारत से रुपये में भुगतान कुबूल कर लिया है. यूरो जोन की करेंसी ”यूरो” डालर का एकाधिकार खत्म करने के लिए बनाई गई है लेकिन आज उसका भी मूल्यांकन डालर में होने लगा है और यूरो भी डालर के मुकाबले गिरता जा रहा है. विश्व में किसी एक करेंसी (डालर) का प्रभुत्व हो जाना भी आर्थिक आधीनता व पराधीनता बन गया है. ब्राजील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका का संगठन ”ब्रिक्स” भी अपनी आपसी मुद्रा में ही व्यापार करने की आर्थिक सुरक्षा बना रहा है.

जब पेट्रोल, डीजल व रसोई गैस के दाम बढ़ते हैं तो राज्यों के टैक्स भी अपने आप बढ़ जाते हैं. क्योंकि राज्यों के टैक्स इन पदार्थों के मूल्यों पर ही आधारित होते हैं. केंद्र की यूपीए सरकार ने यूपीए व कांग्रेस सरकारों से कहा है कि वे इन पदार्थों पर अपने टैक्स उसी तरह कम कर दें जैसे गोवा पहले कर चुका है. मूल्य बढऩे से राज्यों के टैक्स भी बढ़ गए तो उसे उतना ही कम न करें बल्कि उससे भी ज्यादा करें तभी कुछ सार्थक होगा अन्यथा यह भी ड्रामेबाजी हो जायेगी. अब होना तो यह चाहिए कि पेट्रो पदार्थों के मूल्य समाज के हर क्षेत्र व व्यक्तिगत जीवन, व्यापार, परिवहन को प्रभावित करते हैं और पूरी आर्थिक गतिविधि इस पर चलती है, इसलिए पेट्रो पदार्थों पर केंद्र व राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों के सभी टैक्स पूरी तौर पर खत्म कर दिये जाएं.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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