नई दिल्ली  अनाज खुले में ही नहीं, गोदामों में भी सड़ रहा है। बीते वर्षो से गोदामों में रखा भीगा गेहूं खाने योग्य नहीं है। पीडीएस के लिए भेजे गए खराब क्वालिटी के गेहूं को लेकर कई राज्यों ने खाद्य मंत्रालय से शिकायत भी की है। गुणवत्ता के चलते अनाज का निर्यात नहीं हो पा रहा है।

एफसीआइ के एक अधिकारी के अनुसार, भंडारण की आधुनिक तकनीक के अभाव में गोदामों में रखा अनाज खराब होना आम है। अप्रैल से जून तक चलने वाले गेहूं खरीद सत्र के दौरान गेहूं उत्पादक सूबों में आंधी-तूफान और बौछारों का पडऩा आम है। इससे अनाज के भीगकर खराब होने की आशंका रहती है। थोड़ा भी भीगा अनाज सुखाए बगैर गोदामों में रख दिया जाए तो नमी से उसका खराब होना तय है। इससे भी बड़ी चुनौती गोदामों में वर्षो से रखे अनाज को लेकर है। आंकड़ों के मुताबिक, गोदामों में रखा 50 लाख टन से ज्यादा अनाज तीन वर्ष से ज्यादा पुराना है। अगले साल तक यह आंकड़ा 1 करोड़ टन के पार होगा। तय वक्त पर खपत न होने पर अनाज का खराब होना तय है। विशेषज्ञों के अनुसार, गेहूं के तीन साल पुराना होने पर उसकी गुणवत्ता प्रभावित हो जाती है और स्वाद बिगड़ जाता है।

गेहूं की रिकॉर्डतोड़ पैदावार और प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा बिल के तहत वितरण आवश्यकता के मद्देनजर सरकार अनाज भंडारण को लेकर जिस हड़बड़ी में है, उससे खाद्यान्न स्टॉक बेकाबू होता जा रहा है। भंडारण सुविधा के नाम पर पुरानी बंद पड़ी मिलों, खाली मकानों व आनन- फानन में बने फैक्ट्री शेडों को गोदामों में तब्दील कर लाखों टन अनाज रख दिया गया, जहां उसकी गुणवत्ता खराब होना तय है। अनाज रखने से अधिक दिक्कत अनाज बांटने में आने वाली है। आंकड़े कहते हैं कि 23 करोड़ लोगों को दोनों वक्त भरपेट भोजन नहीं मिल पाता है। राशन प्रणाली खामियों से भरपूर है। सड़े अनाज संबंधी राज्यों की शिकायतों के कारण सरकार खाद्य सुरक्षा विधेयक के तहत अनाज बांटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है।

निर्यात के जरिए गेहूं का होगा निपटान-अनाज के भारी भरकम भंडार को देखते हुए सरकार विभिन्न विकल्पों पर विचार कर रही है, जिनमें से एक निर्यात भी है। अगर इसे मंजूरी मिली तो इसका मतलब यह होगा कि छह साल में पहली बार भारत सरकारी भंडार को बेचने के लिए निर्यात बाजार का सहारा लेगा। हालांकि इस प्रस्ताव को लागू करना आसान नहीं है क्योंकि वैश्विक अनाज बाजार में सभी प्रमुख निर्यातक (ऑस्ट्रेलिया व यूक्रेन समेत) देशों के पास भारी भरकम अनाज का भंडार है। गुणवत्ता के मामले में भी भारतीय गेहूं दूसरे निर्यातक देशों के मुकाबले फिट नहीं बैठता। 7 मई को भारत में करीब 710 लाख टन अनाज का भंडार था जबकि भंडारण की कुल क्षमता 660 लाख टन की है। सबसे बड़ी समस्या वित्त के प्रबंधन की होगी क्योंकि इसकी खरीद व भंडारण की लागत साल 2012-13 में करीब 18.22 रुपये प्रति किलोग्राम रहने की संभावना है, वहीं अमेरिकी गेहूं की वैश्विक औसत कीमतें जनवरी-मार्च के दौरान 15.06 रुपये प्रति किलोग्राम थीं।

(डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत 54 मानते हुए)। दूसरे शब्दों में, सरकारी भंडार से गेहूं की बिक्री के लिए सरकार को प्रति किलोग्राम पर करीब 3.16 रुपये की सब्सिडी का इंतजाम करना होगा। कीमतों का यह अंतर केंद्रीय भंडार से गेहूं निर्यात के किसी प्रस्ताव पर आगे बढऩे में सबसे बड़ी बाधा हो सकती है। चावल के मामले में थोड़ी राहत है क्योंकि सरकारी लागत करीब 24.19 रुपये प्रति किलोग्राम बैठती है . जबकि 50 फीसदी टूटे थाईलैंड के चावल की औसत कीमत अप्रैल से मार्च के दौरान 29.52 रुपये प्रति किलोग्राम रही है। अप्रैल में यह बढ़कर 29.59 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया (डॉलर के मुकाबले रुपये को 54 पर मानते हुए)। ऐसे में केंद्रीय भंडार से चावल बेचने पर सरकार 5 रुपये प्रति किलोग्राम का मुनाफा कमा सकती है। हालांकि गेहूं के मामले में समस्या और ज्यादा गंभीर है और अगर तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो समस्या और बड़ी हो सकती है।

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