• आओ मनाएं “स्वतंत्रता दिवस”

जो कह गए शहीद, चलो उसको दुहराएँ
आजादी का पर्व, आओ मिलकर मनाएँ
.है दिन जिसको वीर, जीत कर के लाए थे,
चट्टानों को चीर, मौत से टकराए थे
कर लें उनको याद, जिन्होंने शीश कटाए,
आजादी का पर्व, आओ मिलकर मनाएँ.

नहीं सुगम था मार्ग, बिछे मिलते थे काँटे,
कैसे-कैसे दु:ख, आर्यपुत्रों ने बाँटे
अपना वो इतिहास, कभी भी हम न भुलाएँ,
आजादी का पर्व, आओ मिलकर मनाएँ.
सावरकर, आजाद, भगत सिंह जैसे बेटे,
भारत माँ के नाम, बर्फ पर नंगे लेटे
न मानी हार मगर, दुश्मन को हरा आए,
आजादी का पर्व, आओ मिलकर मनाए.

गुँजित है आज गगन, भारत की हुँकारों से,
हुई थी शुरुआत, क्रांतिकारी नारों से
अपना है अब काम, और आगे ले जाएँ,
आजादी का पर्व, आओ मिलकर मनाएँ

-सुलभा महाशब्दे

हमेशा की तरह इस वर्ष भी पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस जोर-शोर से मनाया जाएगा. स्वतंत्रता दिवस को राष्ट्रीय उत्सव भी कहा जाता है. स्कूलों और सरकारी संस्थानों में यह उत्सव मनाना अतिआवश्यक है. सवाल यह उठता है कि क्या कोई भी उत्सव थोपा जाना चाहिए?
कितने लोग इसे मन से मनाते होंगे? उत्सव क्या बाध्यता से मनाए जाने चाहिए? ऐसा उत्सव जिसे बाध्य करके मनवाया जाता हो उसे उत्सव कहना क्या उचित होगा. इसे राष्ट्रीय उत्सव कहना राष्ट्र और उत्सव दोनों शब्दों के साथ मजाक करना है. इसे राजकीय उत्सव तो कहा जा सकता है, परंतु राष्ट्रीय उत्सव कभी नहीं. क्या मतलब है उस राष्ट्रीय उत्सव का, जिसको राष्ट्र के सभी नागरिक ही अपने मन से नहीं मनाते हों. हम सभी को इस पर भी अवश्य विचार करना चाहिए कि आखिर वह कौन-सा कारण है कि देश के नागरिकों को इसका मतलब समझ में नहीं आता है. और अगर मतलब समझ में आता है और फिर भी स्वयं से मनाना नहीं चाहते हैं. तो ये तो और भी ज्यादा चिंता का विषय है. क्या इसे हम सरकार कि विफलता नहीं कहेंगे कि इतने सालों बाद भी उसका राष्ट्रीय उत्सव देश के आम आदमी तक नहीं पहुंच पाया है. आम आदमी तो इसके पीछे के इतिहास को समझ ही नहीं सका, तो वह इसे हर्षोउल्लास से कैसे मना सकता है।

वास्तव में आजादी मिलने के बाद अपने देश में एक नई संस्कृति और नया राष्ट्र बनाने कि कोशिश शुरू की गई थी। इसलिए इस राष्ट्र से जुड़ी सारी प्राचीन चीजों को नष्ट करके नई संस्कृति को शुरू करने का प्रयास किया गया। नए नेताओं ने व महापुरुषों ने नया इतिहास रचाने कि कोशिश की। अगर पुरानी अस्मिता को नष्ट करके हमारे देश की और राष्ट्र की भलाई होती तो लोग आज परेशान न होते बल्कि आज हम देखते हैं कि पुराने जीवन मूल्यों और परंपराओं कि उपेक्षा करने से समस्याए बड़ी ही हैं कम नहीं हुई स्वतंत्रता दिवस को यदि संविधान स्थापना समारोह के रूप में मनाया जाए तो फिर भी सही है. परंतु इसे राष्ट्रीय उत्सव कहना उचित नहीं है. जो उत्सव देश के आम आदमी को उत्साहित नहीं करता उसे राष्ट्रीय उत्सव कैसे कहें। स्वतंत्रता दिवस को मनाने में जनता का बहुत सारा पैसा लगता है, जो देश के विकास कार्यों के लिए बाधा बन जाता है तो क्या इसे मनाना उचित है?

आजादी का मतलब

मैं आज़ाद भारत में पैदा हुआ था, और उसी आज़ादी के साथ बड़ा भी हुआ. इस बात के लिए मुझे माफ करें यदि मैं 15/8 1947 तक हम पर शासन कर रहे अंग्रेजों के प्रति विशेष रूप से शत्रुतापूर्ण नहीं हूं. आपको मुझे पाकिस्तानियों को उतनी नफरत नहीं करने के लिए भी माफ करना चाहिए जितनी कि मुझसे उम्मीद की जाती है, क्योंकि मैंने जिन्ना की साजिशों और गांधी की उदासीनता के चलते भारत के दो टुकड़े होते हुए नहीं देखा हैं, जैसा कि दूसरे दावा करते हैं. मैं आज़ादी की संतान हूं. न कि उपनिवेशवाद की. और न ही भारत के विभाजन की.

मेरे और मुझ जैसे करोड़ों भारतीयों के लिए, स्वतंत्रता ही सब कुछ है. हम खुद का अधिकार जताते रहना चाहते हैं, तब भी जब हम गलत हो, और सत्य या भय से भी प्रभावित नहीं होते हैं. इसीलिए हमने स्वतंत्रता का चयन किया. इसमें हमें भयभीत हुए बिना बोलने का हक दिया. और यदा-कदा जब भारत के विभिन्न भागों में चुनाव होते हैं, तो हम मतदाताओं के साहस और बुद्धिमत्ता से हैरान होते हैं. कोई सरकार, कोई राजनीतिक पार्टी, कोई नेता कभी भी मतदाताओं के महत्व को कम आंकने के बाद अपना अस्तित्व बनाए नहीं रख सका है. हमने चुनावों में हुए इंदिरा गांधी के अपमान को देखा है, भले ही वे ही एकमात्र ऐसी हों जिसने देश के एकमात्र पूर्ण ताकत से लड़े युद्ध को जीता हो. और वो इसीलिए हुआ क्योंकि उन्होंने हमारी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए एक आपातकाल हम पर थोपा. इसने उनकी विश्वसनीयता को खत्म कर दिया,. न सिर्फ कांग्रेस सत्ता से बाहर फेंक दी गई बल्कि वे संसद में अपनी सीट भी राज नारायण नाम के एक बेवकूफ से हार गई.

अपनी पूरी जिंदगी आजादी से जी लेने के बाद, आज मुझे इसे खतरे में देख कर आश्चर्य होता है. नही, मैं तब विशेष रूप से आश्चर्यचकित नहीं होता, जब सरकार हमारी स्वतंत्रता संक्षिप्त करने की कोशिश करती है. ये अपेक्षित है. ज्यादातर सरकारें हर बहाने का इस्तेमाल करती है, भले ही वो राष्ट्रीय सुरक्षा हो या सामाजिक हित हो, जिससे कि कोशिश कर हमारे अधिकारों पर अंकुश लगा सकें. आस्था, जाति, क्षेत्रीय पहचान, विकास के लक्ष्य, ये सब ऐसे हथियार हैं जिन्हें राजनीतिज्ञ हमेशा भुनाते रहते हैं. हम क्या हैं इस पर जोर राष्ट्र हमें क्या होते देखना चाहता है के बिल्कुल विपरीत है. आज, सभी व्यवहारिक उद्देश्यों के लिए, हम सब सिर्फ एक पैन नंबर हैं जिससे कि हर लेन – देन में ज्यादा से ज्यादा कर वसूला जा सके. जल्द ही हम में से हर एक के पास एक यूआईडी नंबर होगा, हमारे फोन रिकार्ड किए जाएंगे, हमारी पसंद के बारे में पूछताछ की जाएगी, हमारे ईमेल पढ़े जाएंगे, हमारी चैट पर नजऱ रखी जाएगी, और हमारे अधिकारों को खत्म कर दिया जाएगा. सर्वशक्तिमान राष्ट्र जिसे की गुंडों, ठगों और छोटे चोरों के द्वारा चलाया जा रहा हैं, और ज्यादा प्रभावशाली हो जाएगा. भले ही इसके कुछ सबसे प्रतापी साझेदार तिहाड़ में बंद हो और बाकियों के उपर संदेह या शंका के बादल मंडरा रहे हों.

यह तथ्य से कि हमने उन जैसे लोगों को हमारे उपर शासन करने की अनुमति दे दी है दूसरों को भी ऐसी रणनीति अपनाने का साहस देता है. अंडरवर्ल्ड दिन पर दिन धुंधला होता जा रहा है और कानून बनाने वालों और कानून तोडऩे वालों के बीच की पतली सी डोर गायब होती जा रही है. आज हर कोई एक ही तरफ है, मेरे और तुम्हारे खिलाफ. इसके बाद भी, हर कट्टरपंथी समूह हमें भयभीत करना चाहते है, हमारी स्वतंत्रता का न्यूनीकरण करना चाहता है, हमसे बलपूर्वक ऐंठना चाहता है. वे राज्य के जैसे ही तरीके अपना रहे हैं, वैसे ही तर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं. वे हमें हुक्म देना चाहते हैं कि हम क्या पहने, हम क्या खा और पी सकते हैं और किस तरीके से अपने अलग अलग ईश्वरों की पूजा कर सकते हैं, हमैं कौन सी किताबें पढऩी चाहिए, कौन सी फिल्में देखनी चाहिए, किस कला की तारीफ करनी चाहिए और किस को बदनाम करना एवं तहस-नहस करना चाहिए.
-प्रीतीश नंदी

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