विश्व में मंदी के आ रहे दूसरे दौर का असर भारतीय अर्थ व्यवस्था और कृषि व्यवस्था पर पडऩा शुरू हो गया है. मंदी के कारण निर्यात घटने से माल रुकने व भाव गिरने के हालात बन गये हैं. भारत प्याज और लहसुन दोनों का निर्यात करता आ रहा है. निर्यात की कमी से कुछ माह पहले प्याज के भावों में कमी लाकर उसे निर्यात किया अन्यथा उसका उठाव ही रुक रहा था. लहसुन का पिछला माल किसान व व्यापारी को नयी फसल से पहले बेच देना पड़़ता था. लहसुन की फसल जनवरी माह में आती है.

पिछले साल लहसुन के बहुत ऊंचे भाव क्वालिटी के हिसाब से 300 से 400 रुपये प्रति किलो तक हो गया. लहसुन की उपज व व्यापार में बेतहाशा मुनाफा हो रहा था. इसलिए इसकी पैदावार भी बहुत बड़े क्षेत्र में बढ़ा दी गई. ज्यादा फसल का अनुमान और निर्यात में कमी से लहसुन के दाम ऐसे गिरे जैसे कोई पहाड़ की चोटी से गिरकर जमीन पर आ जाये. जो लहसुन 300-400 रुपये किलो पिछले साल बिक रहा था. वह अब 70-80 रुपये किलो की भारी गिरावट में आ गया. जिस क्वालिटी का लहसुन 120 से 250 रुपयों के बीच बिका था. वह अब 20 से 50 रुपए किलो बिक रहा है. यदि लहसुन की नई फसल आने तक यह पुराना माल नहीं बिका तो इसकी कोई कीमत ही नहीं रहेगी.

मध्यप्रदेश में मालवा क्षेत्र खासकर मंदसौर व नीमच में ऊंची क्वालिटी का लहसुन होता है. लेकिन निर्यात आर्डरों के अभाव में लहसुन की नई फसल की हालत कमजोर हो सकती है. भाव और ज्यादा गिर सकते है. विश्व के खाद्य तेल बाजारों में गिरावट चल रही है. देश में भी सोया तेल में मांग का अभाव बना हुआ है. सोया तेल गिरकर रिसेल में 606 रुपये पर आ गया है और इस भाव पर भी इसका लेवाल नहीं है. लेकिन फसल आने तक यह हालत सुधर सकती है. भारत की खाद्य तेलों की खपत 115 लाख टन और इस जरूरत का 45 प्रतिशत भाग आयात होता है. सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिये मलेशिया में पाम आइल आयात किया जाता है. सोयाबीन की अच्छी फसल होने पर तेल की काफी आपूर्ति देश में हो जायेगी. फसल के वक्त सोयाबीन सस्ता रहता है और जब भाव बढ़ते है तो उसका लाभ किसान के स्थान पर व्यापारी वर्ग ले जाता है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

Related Posts: