जब यह प्रगट रूप में सामने आया कि गेहूं, चावल, दलहन व तिलहनों की खेती में ज्यादा रकबा जमीनों पर खेती की गई है और यह हर साल बढ़ती जा रही है. उसी समय यह अंदाजा भी हो जाना चाहिए कि इसके कारण दूसरी फसलें कम की जा रही हैं. अब यह भी स्पष्ट रूप से सामने आ गया है कि मोटे अनाज ज्वार, बाजरा, जौ, मक्का की फसलें कम बोई गई हैं. इस साल इनका उत्पादन घटने की संभावना है. खरीफ मौसम में इनका उत्पादन करीब 20 लाख टन कम रहा है. साल 11-12 में भी यह लगभग इतना ही कम रहेगा.

मोटे अनाज की बुवाई आम तौर पर शुष्क भूमि पर होती है. रबी में इनकी बुवाई 47.8 लाख हेक्टेयर में हुई, जो पिछले साल के मुकाबले करीब 4 लाख 24 हजार हेक्टेयर कम है. महाराष्टï्र में मोटे अनाजों की खेती बहुत ज्यादा है. यहां ज्वार बहुत बोई जाती है, लेकिन इस समय वहां इनके रकबे में सबसे ज्यादा गिरावट आई है. केंद्र सरकार ने यह नीति बनाई है कि प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक के तहत गेहूं, चावल के साथ-साथ पोषक तत्वों से भरपूर मोटे अनाज भी दिये जायेंगे. कई समाजसेवी संगठन यह मांग करते रहे हैं. खाद्य वितरण व्यवस्था के तहत लोगों को एक रुपया प्रतिकिलो की दर से मोटे अनाज दिये जाएं. गत वर्ष 10-11 में सरकार ने एक लाख 28 हजार टन मोटे अनाज खरीदे. इस बार कम उत्पादन होने से मोटे अनाज के वितरण में कमी आने की आशंका से सरकार चिंतित है. व्यापार का नियम खेती पर लागू हो जाता है. यदि किसी वर्ष अनाज, आलू,प् याज, सब्जियों के दाम बढ़ जाते हैं तब आने वाले साल में किसान उसकी खेती का रकबा बढ़ा देते हैं. गेहूं, चावल, दालों, सोया व अन्य तिलहनों में रकबा लगातार बढ़ता ही जा रहा है. इनमें कहीं संतुलन बनाना ही होगा. गांवों में भी गेहूं व चावल खाने वाले लोगों में वृद्धि होती जा रही है.

इन दिनों सोयाबीन के भावों में उतार आ जाने से किसानों ने माल रोक लिया है. सोयाबीन का खाद्य तेल भी उतार पर है. सोयाबीन देश में मध्यप्रदेश में सर्वाधिक होती है और इसे यहां ”केशक्राप” माना जाता है. किसानों की आर्थिक दशा पर सोया के उतार-चढ़ाव का बड़ा असर पड़ता है. सोया की खली में विदेशी व देसी दोनों बाजारों में भाव 100 प्रति क्विंटल टूट गए हैं. इस बात का अभी से खयाल रखना होगा कि कहीं मोटे अनाज खेती से ही बाहर न चले जाएं और इनकी प्रजाति खत्म होने लगे.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
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