पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को दिल का दौरा पड़ा है या पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन का दौर पड़ा है यह निश्चित तो नहीं है. लेकिन वहां नागरिक सत्ता और फौज के बीच खिंचाव तो अमेरिका द्वारा पाकिस्तान में जाकर ओसामा बिन लादेन को ढेर कर देने के बाद ही शुरू हो गया था. पाकिस्तान की सबसे बड़ी मजबूरी यही है कि वहां सरकार, फौज या कोई आतंकी संगठन यह नहीं कह सकता कि उसे लादेन का पता था. वह भी स्पष्टï है कि वह फौज के संरक्षण में एब्टाबाद में फौज की मिलीट्री अकेदमी के पास रह रहा था.

हाल ही में फौज व सरकार के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया. जब अमेरिका के मेमोगेट खुलासे में यह जाहिर हुआ कि राष्ट्रपति जरदारी अमेरिका स्थित अपने राजदूत हक्कानी के मार्फत अमेरिकी प्रशासन को संदेश भेजा था कि पाकिस्तान में फौज जरदारी सरकार का तख्ता पलट सकती है. ऐसे हालत में अमेरिका सरकार की मदद करे. जैसा सभी जगह होता आ रहा है. उसी तर्ज पर हक्कानी व जरदारी दोनों ने ही इस संदेश को जाली और फरेब बताया. हक्कानी को पाकिस्तान बुलाया और उनका राजदूत पद से स्तीफा ले लिया गया. इसी से यह जाहिर हो गया कि इसमें कुछ सच्चाई या शक पैदा हो गया था. सेनाध्यक्ष जनरल कयानी भी पाकिस्तान में भारी दबाव में चल रहे हैं. एक तो लादेन का अमेरिकी सीना जोरी में मारा जाना और हाल ही में अफगान सीमा के पास पाकिस्तान की फौजी चौकियां पर ड्रोन हमले में 24 पाक फौजियों के मारे जाने से पाकिस्तान में सत्ता और फौज दोनों मे भारी उथल-पुथल मच गई है. हालत यह है कि कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा और यह समझ में नहीं आ रहा है कि क्या किया जाये. जनरल मुशर्रफ को सत्ता से जिस दबाव में हटना पड़ा था उसे देखते यह नहीं लगता कि वह फौज फिर से सीधे-सीधे नागरिक प्रशासन को खत्म करके सत्ता पर फौजी कब्जा करना चाहेगी. ऐसी संभावना दिख रही है कि अब वहां सरकार तो फौज ही चलायेगी. लेकिन नागरिक सरकार का मुखौटा लगा रहेगा.

श्री जरदारी के राष्ट्रपति बनने के बाद सत्ता वे ही चला रहे थे और प्रधानमंत्री सत्ता प्रमुख के रूप में सामने नहीं आते थे. कुछ समय बाद श्री जरदारी को केवल संवैधानिक रूप मे प्रमुख रूप से रोजमर्रा की राजनीति से दूर कर दिया और वे सत्ता के मामले में खामोश कर दिये गये. प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी ने ही सत्ता की कमान सम्हाल ली. इस समय श्री जरदारी पाकिस्तान में सत्ता नहीं चला रहे है. ‘दिल का दौरा’ दिखाकर स्वास्थ्य के कारणों पर वे अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं. पाकिस्तान सरकार अभी तालिबानों के पक्ष में भी कुछ प्रदर्शित कर रही है. उन्हें शासन ने इस बात के लिए धन्यवाद दिया है कि उन्होंने मोहर्रम के दौरान आतंकी हमले नहीं किये. फिलहाल जरदारी दुबई में दिल का दौरा पडऩे के कारण अस्पताल में भर्ती हैं. राजनैतिक अनुमान यह है कि वह अब दुबई से काफी अर्से तक पाकिस्तान नहीं लौटेंगे और वहीं से पद से इस्तीफा भेज दें. पाकिस्तान की सभी घटनाओं का अमूमन भारत पर प्रभाव पड़ता है. यदि सत्ता की उथल-पुथल में फौजा का सत्ता पर दबदबा बन जाता है तो यह भारत के लिए चिन्ता का विषय होगा.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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