नई दिल्ली, 12 फरवरी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अलग हो चुकी पत्नी को पति के घर रहने का अधिकार है. साथ ही घरेलू हिंसा कानून के तहत उसे पति से गुजारा भत्ता मिलना चाहिए, भले ही पत्नी कानून लागू होने से पहले अलग हुई हो.

न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर और न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर ने राजधानी के वरिष्ठ नागरिकों के वैवाहिक विवाद को निपटाते हुए यह फैसला दिया. देश की शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा कि महिलाएं और पीडि़त 2005 के घरेलू हिंसा कानून में महिला संरक्षण के प्रावधानों का उपयोग कर सकती है, भले ही कथित हिंसा कानून लागू होने के पहले हुई हो. न्यायमूर्ति कबीर ने आदेश में लिखा कि हमारे विचार से दिल्ली हाईकोर्ट ने सही फैसला किया कि भले ही पत्नी, जो पूर्व में घर में साथ रहती थी लेकिन कानून के लागू होने वक्त अलग हो चुकी थी, वह भी 2005 के कानूनों के तहत संरक्षण की हकदार है. वी डी भनोट और सविता भनोट की शादी 23 अगस्त 1980 को हुई थी लेकिन जुलाई 2005 में उन्होंने मतभेदों के बाद अलग रहने का फैसला किया.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति, पत्नी को अपने आवास का एक उचित हिस्सा और उसके गुजारे के लिए सारी जरूरी सुविधाएं मुहैया कराए. न्यायालय ने कहा कि परिसर का वह हिस्सा पत्नी की च्च्छा के मुताबिक सुविधाओं से लैस हो ताकि वह सम्मान के साथ जी सके. 29 नवंबर 2006 को सविता ने मजिस्ट्रेट के समक्ष एक याचिका दायर कर 2005 के घरेलू हिंसा कानून के तहत संरक्षण की माग की. मजिस्ट्रेट ने पति को निर्देश दिया कि वह पत्नी को मासिक 6,000 रुपये का गुजारा भत्ता दे और मकान का प्रथम तल रहने को दे जिसके बारे में महिला का दावा था कि यह उनका स्थाई वैवाहिक निवास था. आदेश से नाखुश महिला ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष अपील की जिन्होंने 18 सितंबर 2009 को इसे रद्द कर दिया. न्यायाधीश ने अपील को इस आधार पर खारिज कर दिया कि सविता ने चार जुलाई 2006 को घर छोड़ दिया था जबकि कानून 26 अक्टूबर 2006 को लागू हुआ.

मेरठ दंगे के आरोपियों को 4-4 साल की कैद

मेरठ. उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर के एक बड़े हिस्से को दंगों की आग में झोंकने के आरोपी छह लोगों को रविवार को एक अदालत ने दोषी करार देते हुए 4-4 साल कैद और जुर्माने की सजा सुनाई. अपर सेशन जज वी. एस. पटेल ने उपलब्ध सबूतों और गवाहों के बयान के आधार पर 16 जून 2009 के दंगे के सिलसिले में आरोपी इरशाद, जीशान, नदीम, राशिद, मुमताज और शमशाद को विभिन्न धाराओं में 4-4 साल के कारावास और 2-2 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई. इस मामले में सरकारी वकील यशवंत सिंह ने बताया कि शहर में हुए दंगों के मामले में 26 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था. अन्य आरोपियों का मामला अन्य अदालतों में विचाराधीन है.

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