अभी तक तो महंगाई ही पूरी अर्थ-व्यवस्था और पूरी जनसंख्या को ही मार रही है. देश में विकास दरों में गिरावट और खाद्यान्नों के मूल्य के साथ अन्य वस्तुओं के मूल्य बढ़ते जाने के कारण ये महंगाई और मुद्रास्फीति बेलगाम हो चुकी है. इसका एक बहुत बड़ा कारण बैंकों की पून्जी पर ब्याज दरों का लगातार बढऩा है. रिजर्व बैंक ने रिकार्ड स्तर पर लगातार 13 बार बैंक ब्याज दरों को बढ़ाया. उसनेअभी हाल ही में दो बार इन्हें घटाया और फिर उन्हें यथावत (स्टेट्स को) कर दिया.

हर बार यही तर्क दिया गया कि मूल्यवृद्धि के कारण मुद्रास्फीति बहुत ज्यादा है इसलिये ब्याज दर घटाना वांछनीय नहीं है. लेकिन इसका ऐसा विपरीत असर होता रहा है कि मूल्यवृद्धि और मुद्रास्फीति नीचे नहीं आये, लेकिन औद्योगिक मैन्युफेक्चरिंग क्षेत्र में भारी गिरावट आ गई. उत्पादन घट गये और रोजगार के अवसरों में भी कटौती हो गई. अब तीन साल के अन्तराल के बाद श्री चिदम्बरम गृह मंत्रालय से वापस वित्त मंत्रालय में लौटे हैं. यह तो नहीं कहा जा सकता कि इस पुन: आगमन से उनमें अति उत्साह की भावना है, लेकिन संतोष की यह बात स्वीकार कर ली है कि मौजूदा ब्याज दरें काफी ऊंची हैं. इस मामले में केन्द्रीय वित्त मंत्रालय रिजर्व बैंक से मिलकर इसका हल निकालने में जुटा है. श्री चिदम्बरम ने इस संबंध में रिजर्व बैंक के गवर्नर श्री डी. सुब्बाराव को बुलाकर अर्थ-व्यवस्था पर व्यापक चर्चा की.

श्री चिदम्बरम का यह कथन भी लोगों को शब्द राहत तो पहुंचाता है कि महंगाई को जल्दी ही नीचे लाया जायेगा तथा कीमतों में स्थिरता लाना सरकार की प्राथमिकता है. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि मूल्यों पर भारी दबाव है और विशेषकर खाद्य महंगाई बहुत ऊंची है. कारणों में पुरानी बात ही दुहराई गई है. पेट्रो क्रूड के भाव अस्थिर व ऊंचे बने हुए हैं और डालर के मुकाबले रुपये के मूल्य में गिरावट से आयात की सभी वस्तुएं महंगी हो गई हैं. भारत में निवेश की स्थिति दयनीय स्थिति में पहुंच गई है. रुपये के अवमूल्यन से विदेशी निवेशकों ने अपनी पून्जी भारतीय बाजारों से उठा ली. इससे औद्योगिक व व्यापारिक क्षेत्र लडख़ड़ा गया. निवेश को वापस लाने के लिये अर्थ-व्यवस्था में व्यापक फेेरबदल किये जा रहे हैं. इसके लिए नरम और ज्यादा उदार वित्तीय व आर्थिक नीतियां लाई जा रही हैं. इसके लिये टैक्स नीतियों में बदलाव व ब्याज दरों में कमी लाना लगभग निश्चित ही दिखाई पड़ रहा है.
भारत की सार्वजनिक क्षेत्र के जिन उपक्रमों के पास भारी नगदी है उन्हें उस पूंजी को निवेश में लाने के लिये कहा जायेगा. मूल्यों पर कार्यवाही करने के लिये सरकार के पास जो अनाज का भंडारण है, उसे बाजार में लाया जायेगा. खाद्यान्नों के मूल्य घटने से पूरी अर्थ-व्यवस्था पर यही असर होगा कि सभी मूल्य नीचे आने लगेंगे.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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