इन दिनों खाद्यान्नों व सब्जियों में मूल्य वृद्घि का दौर आया हुआ है. वजह यही बताई जा रही है कि लगभग हर जगह भारी बरसात के कारण यातायात अस्त व्यस्त हो जाने से इसकी आवक जावक बनाये रखना मुश्किल हो गया है. कुछ महीनों पहले यह दलील दी जा रही थी कि देश में अल्प वर्षा के कारण सूखे के आसार हैं. फसलें बिगडऩे लगी हैं. इसलिये मूल्य वृद्घि हो रही है.

इस तरह के अनुमान केवल सटोरिये और बिचौलिये ही लगाते हैं और उसके आधार पर अनुमानित व काल्पनिक वस्तुओं की कमी पर सट्टा बाजारी व व्यापार में मूल्य बढ़ा देते हैं. इस मूल्य का कोई भी लाभ उत्पादनकर्ता किसानों को नहीं मिलता है. दूसरी ओर आम उपभोक्ता के लिये वस्तुयें महंगी हो जाती हैं. देश में वर्षा की हर स्थिति में देश को यह दिलासा जरूर दी जाती है कि बम्पर फसलें आईं, सरकार के पास भरपूर बफर स्टाक है. देश में कोई अभाव की स्थिति नहीं आ पायेगी, लेकिन इन दिलासाओं के बाद भी मूल्य वृद्घि नहीं रुकती है और निर्यात भी जारी रहता है. इन दिनों भारत से गेहूं निर्यात के सौदे हो रहे हैं.
इस सबके बावजूद सट्ïटा व्यापार पर कोई रोक नहीं लग रही है. निर्यात के लिये यह दलील दी जाती है कि उपज व स्टाक बहुत ज्यादा हो गया है. इसलिये निर्यात करना जरूरी है. शक्कर के निर्यात पर यह दलील दी जा चुकी है कि मिलों को गन्ना किसानों का बहुत बकाया देना है इसलिये मूल्य वृद्घि आवश्यक है. यह भी कहा गया है कि उन दिनों अंतरराष्टï्रीय बाजार में शक्कर के ऊंचे दाम चल रहे हैं. इस समय शक्कर के निर्यात से चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो जायेगी.

सरकार की इन सभी नीतियों से आम उपभोक्ता का हित कहीं भी नजर नहीं आता है. गत जुलाई माह में खाद्यान्नों की मूल्य वृद्घि लगभग 10 प्रतिशत तक पहुंच गई. सब्जियों में 27.33, खाद्य तेल 17.37, दालें 12.49 और दूध के भावों में 12 प्रतिशत मूल्य वृद्घि हो गयी. इसी महंगाई को मुद्रा स्फीति कह कर रिजर्व बैंक भी ब्याज दरों को बढ़ाता रहा और इस समय इन्हें स्थिर (स्टेट्ïस को) कर दिया. इससे औद्योगिक क्षेत्र में जूनी पूँजी महंगी और निर्मित वस्तुयें महंगी हो जाने से उनमें उपभोक्ता द्वारा उठाव बहुत कमजोर हो गया. उद्योग घाटे में आ गये और रोजगार के अवसर भी कम हो गये. वायदा बाजारों में वस्तुओं की कीमते ऊंची होती जा रही हैं. सरकार की तरफ से यह कहा तो जा रहा है कि हाजिर व वायदा बाजार पर सरकार नजर रख रही है, लेकिन इसका कहीं कोई असर नहीं दिख रहा है. नदियों के तटों पर बसे खेतों में ही बाढ़ का असर होता है. बाकी दूर के खेतों में वर्षा से लाभ ही होता है. सब्जी व्यापारियों का कहना है कि किसान अपनी सब्जी का स्टाक कर ही नहीं सकता. वह एक दिन में ही खराब होने लगती है. खेतों में भी उसे लगाये नहीं रखा जाता है. दूध को भी रोका नहीं जा सकता. वह हर दिन का उत्पाद होता है. सब्जी केवल गर्मी में कम आती है, लेकिन ज्यादातर सब्जी के खेत सिंचाई वाले होते हैं.

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