अमेरिकी राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा ने इराक में युद्ध समाप्ति की घोषणा कर दी. वैसे अमेरिका अपना युद्ध नाटो के नाम से उसका नेतृत्व करके चलाता है. इस नाटो सैन्य संधि के देशों की सेनाएं भी रहती है लेकिन मुख्य भूमिका अमेरिका की होती है. इस समय अमेरिकी नाटो के नाम से इराक, अफगानिस्तान व लीबिया में सैन्य कार्यवाही में लिप्त है. अब उसने इराक में नाटो युद्ध बंद कर दिया है और अपनी सेनाएं वापस बुला रहा है. अमेरिका भी इन दिनों आर्थिक मंदी के गहन दौरों से गुजर रहा है. एक मंदी का दौर गुजरा ही था कि हाल ही दूसरा दौर शुरू हो गया. वहां की पूंजीवादी व्यवस्था व लोगों की पूंजीवादी जीवन शैली में पहली बार लोगों ने न्यूयार्क की ‘वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो’ के नारों के साथ अमेरिका व यूरोपीय देशों के लगभग 200 शहरों में यह आंदोलन फैला दिया. अमेरिका में यह मांग भी अमेरिका कांग्रेस, सीनेट व आम लोगों में बढ़ती जा रही है कि अमेरिका बाहरी देशों में सैन्य कार्यवाहियां बंद कर वहां से अपनी सेनाएं वापस बुलाये और राष्ट्र के खर्चों में कमी लाये. संभवत: इसी संदर्भ में श्री ओबामा ने यह इराक युद्ध बंद करने और सैनिकों को वापस बुलाने की घोषणा की है. इस घोषणा के साथ ही श्री ओबामा ने इरान का नाम लिये बगैर लेकिन उसे परोक्ष रूप से इंगित करते हुए यह चेतावनी दी है कि अमेरिका उसके सैनिकों की वापसी के बाद भी इराक में अपनी अग्रणी भूमिका निभाता रहेगा.

श्री ओबामा के पूर्ववर्ती राष्ट्रपति श्री जार्ज बुश ने 2003 में इराक पर हमला किया था और उसका बहाना बनाया था कि उसके पास रासायनिक हथियार हैं, उन्हें नष्ट करना है. जबकि संयुक्त राष्ट् टीम ने निरीक्षणों तथा युद्ध के बाद भी वहां ऐसे कोई रासानिक हथियार नहीं मिले. अमेरिका ने सद्दाम को सत्ता से हटा दिया और उनकी फरारी के बाद उन्हें खोज कर फांसी पर चढ़ा दिया. जैसे हाल ही पाकिस्तान में ओबामा बिन लादेन को ढूंढकर एबटाबाद के स्थान पर ही ढेर कर दिया. हाल ही में नाटो फौजों के नेतृत्व लीबिया की विद्रोही सेनाओं ने वहां सत्ता परिवर्तन कर राष्ट्रपति कर्नल गद्दाफी को मार डाला. युद्ध समाप्ति व सेना वापसी के अवसर पर इराक की सरकार की हौसला अफजाई करने हेतु श्री ओबामा ने कहा कि इराक द्वारा एशिया की दो बड़ी शक्तियों भारत व चीन के मुकाबले अधिक तेजी से प्रगति करने की उम्मीद है. पेट्रो फ्रूड उत्पाद बढऩे के साथ इराक एक बार फिर से क्षेत्र के अग्रणी पेट्रो तेल के उत्पादकों में से एक होगा. इस समय इराक अपनी देश के पुनर्निर्माण और अर्थ व्यवस्था को मजबूत कर रहा है. लेकिन चिंता का विषय यही है कि इराक में सत्ता के विरुद्ध आतंकी हमले खास कर राजधानी बगदाद में होते जा रहे है. इसी तरह अफगानिस्तान में भी तालिबानों को सत्ता से हटाकर व्यवस्था को प्रजातंत्रवादी बनाकर श्री हमीद करजई को राष्ट्रपति बनाया गया है. लेकिन वहां भी तालिबानी आतंकवादी के हमले जारी है. काबुल में भारत सहित कई देशों के दूतावासों पर भी हमले हो चुके हैं. वर्तमान में अमेरिको यह घोषणा कर चुका है कि वह 2014 तक अफगानिस्तान से अपनी फौजें हटा लेगा. लीबिया में नाटो सेनाओं ने कर्नल गद्दाफी को सत्ता से हटाकर और मरवाकर वहां मुस्तफा अब्दील जलील के नेतृत्व में वहां अंतरिम सरकार बना दी है. इस सरकार के विरुद्ध भी देश भर में बड़ी-बड़ी रैलियां निकल रही है. इसके अलावा गद्दाफी समर्थित सैनिक अभी भी वहां गृहयुद्ध की स्थिति बनाये हुए हैं. कई इलाकों पर इन विद्रोहियों का कब्जा है. लीबिया अभी भी अशांत है. दूसरी ओर प्रशांत महासागर में नौ सैनिक प्रभुत्व के लिये अमेरिका यहां भी अपनी शक्ति बढ़ा रहा है. आर्थिक मंदी के दौर में तीन बड़े पेट्रो उत्पादक देश कुवैत, इराक व लीबिया तथा उसके सहयोगी साउदी अरब इन दिनों अमेरिका के प्रभुत्व में आ चुके हैं. अमेरिका अब तक सद्दाम हुसैन, ओसामा बिन लादेन व कर्नल गद्दाफी को निपटा चुका है.

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