सिंचाई कृषि राज्य मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी जरूरत है और यह उसका उत्साहवर्धक कीर्तिमान भी है कि वह हर साल औसतन एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता बढ़ा रहा है. अब मध्यप्रदेश के कृषि स्वरूप में बड़े परिवर्तन का रूप भी तैयार किया जा रहा है. राज्य रासायनिक खाद की खेती में अपने को बदल बायो खाद से खेती का राज्य बनने जा रहा है. इसके खाद्यान्न, सब्जियां व फल पूरी तरह पौष्टिक, प्राकृतिक स्वाद वाले और रासायनिक अवगुणों से मुक्त होकर पूर्ण पौष्टिक होते हैं.

1947 की आजादी के बाद से 50 सालों तक प्रदेश में कुल 21 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में प्रदेश में सिंचाई की क्षमता थी. अब यह क्षमता बढ़कर लगभग 30 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई है. यह आगे के वर्षों में 1993 से 2003 तक वहां सिर्फ 2.3 लाख हेक्टेयर तक पहुंची थी. लेकिन इसके बाद सिंचाई के कामों में बहुत तेजी लाई गई. पिछले 8 सालों में यह सिंचाई क्षमता भी 8 लाख अतिरिक्त हेक्टेयर तक फैला दी गई. अब अगले साल तक 7 लाख हेक्टेयर में अतिरिक्त सिंचाई क्षमता बढ़ाई जा रही है. कृषि के क्षेत्र में देश में अपनी तरह की पहली किसानों के लिए एक द्विभाषीय वेब पोर्टल कृषि नेट विकसित की गई है. हिन्दी भाषा में खेती एवं खेती से संबंधित सभी तकनीकी व्यवसायिक व विभागीय शासकीय योजनाओं की जानकारी हर समय किसानों को उपलब्ध रहेगी. इसमें राजधानी से लेकर विकासखंड स्तर के कार्यालयों को इन्टरनेट के माध्यम से आपस में जोड़ा गया है. राज्य के सभी 313 विकासखंडों में किसान ज्ञान सूचना केन्द्र स्थापित किये गये हैं.

इन तमाम कृषि उन्नत प्रयासों में केन्द्र सरकार की वजह से रासायनिक खाद आपूर्ति में भारी दिक्कत आ रही है. राज्य की जरूरत के हिसाब से प्रदेश में रोज 10 मालगाड़ी के रेक आने चाहिए, उसके मुकाबले केवल 3 रेक ही रोज आ रहे हैं. प्रदेश में यूरिया की भारी कमी चल रही है. मुख्यमंत्री श्री चौहान पूर्व में भी दिल्ली जाकर केन्द्रीय रसायन मंत्री श्रीकांत जैना और रेलमंत्री श्री दिनेश त्रिवेदी से मिल चुके हैं और अभी फिर उनसे अनुरोध किया है कि वे मध्यप्रदेश को खाद की पूरी सप्लाई भेजें. इस अभाव के कारण राज्य मे खाद की कालाबाजारी व मिलावटी खाद की समस्या बढ़ रही है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
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