उज्जैन 21 दिसंबर. महाकाल की नगरी उज्जैन में सन् 2016 के सिंहस्थ को लेकर प्रदेश का वर्तमान भाजपा सरकार चितिंत तो है ही सिंहस्थ निर्माण कार्यों के लिए भी करोड़ो रुपए की स्वीकृति प्रदान कर दी गई है. लेकिन बावजूद इसके अभी तक निर्माण कार्य शुरु नहीं हो सके है. जबकि पर्व में केवल चार वर्ष ही शेष रह गए है. यदि निर्माण कार्य ऐन वक्त पर प्रारंभ हुए तो न केवल इन पर लीपा-पोती ही होगी वरन् स्तर भी घटिया ही रहेगा और इसका खामियाजा शहरवासियों को ही भुगतना पड़ेगा.

उज्जैन में सिंहस्थ मेला प्राधिकरण की स्थापना शासन द्वारा की जा चुकी है और इसी के माध्यम से सिंहस्थ के मुख्य कार्य व अन्य सभी कार्यवाही संपादित होना है लेकिन अभी भी सिंहस्थ मेला प्राधिकरण को जिस तरह से अधिकार दिए जाने चाहिए थे, नहीं दिए जा सके है. फलस्वरूप अभी भी सारा दारोदार शासन पर तथा अधिकारियों पर है और प्राधिकरण केवल कागजों पर सीमित हो कर रह गया है. शासन स्तर पर सिंहस्थ को लेकर करोड़ो रुपए स्वीकृत कर दिए है तथा इस संबंध में पिछले दिनों भोपाल में बैठक आयोजित हो चुकी है. प्रश्न यह उठता है कि यदि रुपए स्वीकृति के बाद संबंधित मदों में आ गए है तो फिर निर्माण कार्यों की शुरुआत क्यों नहीं हो सकी है. वीजिट होती है सिर्फ – सिंहस्थ निर्माण कार्यों को लेकर केवल स्थलों की वीजिट ही अभी तक हुई है परंतु निर्माण कार्यों को शुरु करने के लिए कोई ठोस योजना अभी तक सामने नहीं आई है. न तो इस दिशा में मीडियाकर्मियों को ही अवगत कराया जा रहा है और न ही योजना का खुलासा करा जाता है ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके. यह ज्ञातव्य है कि निर्माण कार्य यदि शीघ्र शुरु हो जाते है तो गुणवत्ता तो बरकरार रहेगी ही, निर्माण कार्यों को पूरा होने में पर्याप्त समय भी मिल सकेगा. इधर नागरिकों का कहना था कि सड़क निर्माण कार्य के साथ ही पेयजल टंकियों का तथा पुलों का निर्माण कार्य पर्याप्त मात्रा में सिंहस्थ मद से होना चाहिए.
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अतिक्रमण पसरा
सिंहस्थ क्षेत्रों में अतिक्रमण पसरा पड़ा है लेकिन इस ओर जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों का ध्यान नहीं है. सिंहस्थ के कई ऐसे क्षेत्र भी है जहां पक्के निर्माण कार्य तक हो चुके है और इन्हें हटाने में प्रशासन को पसीना भी आ सकता है क्योंकि बताया गया है कि इस तरह के पक्के अवैध निर्माण दबंगों द्वारा किए गए है. अवैध अतिक्रमण की बात कलेक्टर डॉ. एम. गीता के समक्ष पत्रकारों द्वारा उठाई जा चुकी है लेकिन इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए जाने के कारण अतिक्रामकों के हौंसले बुलंद है.

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