• बजा न्याय का डंका

जुर्म माफी के लायक नहीं: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली, 29 अगस्त. सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई पर वर्ष 2008 में हुए आतंकवादी हमले में पकड़े गए एकमात्र जीवित आतंकवादी अजमल आमिर कसाब की फांसी की सजा बुधवार को बरकार रखी है.

मुंबई की एक विशेष अदालत ने वर्ष 2010 में कसाब के खिलाफ फांसी की सजा सुनाई थी. कसाब ने इस फैसले को बंबई हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे न्यायालय ने फरवरी 2011 में अमान्य कर दिया था. गौर हो कि बंबई हाईकोर्ट ने कसाब को फांसी की सजा सुनाई थी. कसाब की सारी दलीलें खारिज करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आज के फैसले में कहा कि उसका जुर्म माफी के लायक कतई नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारे पास कसाब की मौत की सजा को बरकरार रखने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है. देश के खिलाफ युद्ध छेडऩा कसाब द्वारा किया गया सबसे बड़ा अपराध है.

शीर्ष कोर्ट ने कसाब की इस दलील को अस्वीकार किया कि 26/11 के आतंकी मामले में उसके मामले की निष्पक्ष सुनवाई नहीं हुई. सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई हमलों में आमिर अजमल कसाब की सजा-ए-मौत बरकरार रखते हुए कहा कि मामले की सुनवाई से पहले के चरण में सरकार द्वारा कसाब को वकील मुहैया नहीं कराना मामले में उसकी सुनवाई को प्रभावित नहीं करता. कसाब का इकबालिया बयान स्वैच्छिक था. गौर हो कि कसाब ने इस आतंकी हमले में उसे मौत की सजा दिये जाने के विशेष अदालत के निर्णय को चुनौती दी थी. इस हमले में 166 व्यक्ति मारे गए थे. न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति सीके प्रसाद की पीठ ने कहा कि हम इस रुख को बरकरार रखने के लिए बाध्य हैं कि फांसी ही एकमात्र ऐसी सजा है, जिसे इस मामले की स्थितियों में दी जा सकती है. निचली अदालत ने कसाब को मृत्युदंड सुनाया था और बाद में बम्बई उच्च न्यायालय ने उसकी सजा को बरकरार रखा था. उसके बाद उसने मृत्युदंड के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी.

खारिज किए तर्क
न्यायालय ने कसाब के इस तर्क को खारिज कर दिया कि मुम्बई पर हुआ आतंकवादी हमला भारत सरकार के खिलाफ युद्ध था, न कि भारत या यहां के लोगों के खिलाफ.

न्यायालय ने कहा कि भारत सरकार, देश का एकमात्र निर्वाचित अंग और सम्प्रभु सत्ता का केंद्र है. इसके बाद न्यायालय ने कहा कि आरोपी का प्राथमिक और मुख्य अपराध भारत के खिलाफ युद्ध छेडऩा ही था. न्यायालय ने कसाब की अपील खारिज करने के साथ ही इस आतंकी वारदात में सबूतों के अभाव में दो अन्य अभियुक्तों को बरी करने के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार की अपील भी खारिज कर दी. न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति चंद्रमौलि कुमार प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि कसाब ने भारत के खिलाफ युद्ध छेडऩे की साजिश में शामिल होने का अपराध किया है. न्यायाधीशों ने कहा कि मुंबई पर आतंकी हमले के तथ्यों, साक्ष्यों और परिस्थितियों के मद्देनजर मोहम्मद अजमल कसाब को मौत की सजा देने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है.

न्यायाधीशों ने कसाब की इस दलील को ठुकरा दिया कि उसके मुकदमे की निष्पक्ष सुनवाई नहीं हुई. न्यायालय ने कसाब के इकबालिया बयान के बारे में कहा कि यह स्वेच्छा से दिया था. निचली अदालत में मुकदमे की सुनवाई के दौरान वह इससे मुकर गया था. मुकदमे की सुनवाई के दौरान उसे वकील मुहैया नहीं कराने के कसाब की दलील अस्वीकार करते हुए न्यायालय ने कहा कि निचली अदालत ने सुनवाई के दौरान इस बारे में बार बार आग्रह किया था लेकिन उसने हर बार इसे ठुकरा दिया था. शीर्ष अदालत ने उच्चतम न्यायालय में कसाब का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन को सौंपी थी. राजू रामचंद्रन ने न्यायालय के फैसले पर संतोष व्यक्त किया.

उच्च न्यायालय ने 21 फरवरी, 2011 को कसाब का मृत्युदंड बरकरार रखा था. इसके पहले मुम्बई की एक अदालत ने छह मई, 2010 को उसे फांसी की सजा सुनाई थी. अन्य आरोपों के अलावा उसे राष्ट्र के खिलाफ युद्ध छेडऩे का दोषी पाया गया था. सर्वोच्च न्यायालय ने तीन महीने तक चली बहस के बाद अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था. मामले की सुनवाई 31 जनवरी से शुरू हुई थी. कसाब और उसके नौ साथी कराची से समुद्र मार्ग से मुम्बई पहुंचे थे. उसके बाद उन्होंने एक निजी भारतीय नौका एम.बी. कुबेर को अगवा कर लिया था और उसके नाविक अमर चंद सोलंकी को मार डाला था. गौर हो कि मुंबई पर 26 नवंबर 2008 को हमला करने वाले 10 आतंकवादियों में से कसाब एकमात्र ऐसा आतंकवादी है, जिसे जीवित पकड़ा गया था. इस हमले में 166 लोग मारे गए थे.

कसाब को मिले जल्द फांसी

कांग्रेस ने मुंबई हमलों के मामले में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा आमिर अजमल कसाब की मौत की सजा बरकरार रखे जाने के फैसले का स्वागत किया और कहा कि उसे जल्द फांसी दी जानी चाहिए. दिग्विजय सिंह ने कहा अब उसे जल्द सजा मिलनी चाहिए. कसाब की मौत की सजा को बरकरार रखते हुए कोर्ट ने कहा कि देश के खिलाफ युद्ध छेडऩा पाकिस्तानी आतंकवादी का सबसे बड़ा गुनाह है.

पाकिस्तानी आतंकवाद का बड़ा अपराध

जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस चंद्रमौलि कुमार प्रसाद की बेंच ने कसाब की मौत की सजा को आज सही ठहराते हुए कहा कि देश के खिलाफ युद्ध छेडऩा पाकिस्तानी आतंकवादी का सबसे बड़ा अपराध है. बेंच ने उसकी इस दलील को भी स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि उसके मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष सुनवाई नहीं हुई. जजों ने यह भी कहा कि मामले की सुनवाई के पूर्व के चरण में सरकार द्वारा कसाब को वकील मुहैया कराने में विफल रहने से उसके खिलाफ अदालती कार्यवाही प्रभावित नहीं हुई है.

जल्द से जल्द फांसी
केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा है कि सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि कसाब को जल्द से जल्द फांसी मिलेगी.

बिना देरी फांसी दें
भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा, ‘जिन्होंने देश के खिलाफ युद्ध छेड़ा और निर्दोष लोगों की जान ली, वे किसी दया के हकदार नहीं हैं. बिना देरी के कसाब को फांसी पर लटकाया जाना चाहिए.

पाक से संबंध तोड़े

विश्व हिन्दू परिषद ने तो सीधे-सीधे पाकिस्तान के खिलाफ अपना मोर्चा खोलते हुए जहां कसाब व अफजल गुरु को बिना समय गंवाए फांसी पर लटकाने की वकालत की है वहीं नसीहत देते हुए कहा है कि भारत सरकार को भी अमेरिका के पदचिन्हों पर चलते हुए पाकिस्तान पर हमला बोलना चाहिए.

विश्व हिन्दू परिषद का कहना है कि जिस तरह से 9/11 हमले को लेकर अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला बोला था उसी राह पर चलते हुए भारत को भी पाकिस्तान पर हमला बोलना चाहिए. भारत को पाकिस्तान के साथ अपने व्यापारिक-राजनयिक इत्यादि सभी संबंध तोड़ देने चाहिए. विहिप ने कहा है कि अब तो जुंदाल ने भी अपनी जुबान से बोल कर यह साबित कर दिया है कि भारत में आतंक के लिए जेहादियों को पाकिस्तान मदद कर रहा है. सरकार को चाहिए वह देश में चल रहे उन मदरसों को भी तुरंत प्रभाव से बंद करवाए जिनमें जेहाद का पाठ पढ़ाया जा रहा है. विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर प्रवीण तोगडिय़ा ने कहा है कि अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी कसाब की फांसी पर अपनी मुहर लगा दी है अब देरी किस बात की.

मुंबई हमले के मामले की पैरवी कर रहे मुंबई के अधिवक्ता उज्जवल निकम, गोपाल सुब्रह्मण्यम व मुंबई पुलिस की सराहना करते हुए कहा कि सभी ने मुंबई पर हुए जेहादी हमले को कानूनी रूप से बहुत ही संजीदा तरीके से पेश किया और उसी का नतीजा है कि निचली कोर्ट से लेकर शीर्ष न्यायालय तक सभी ने कसाब की फांसी को बरकरार रखा. उन्होंने कहा जिस महत्व के साथ वकीलों ने केस लड़ा अब उससे भी महत्वपूर्ण कसाब को शीघ्र फांसी देना है. विश्व हिन्दू परिषद ने जारी अपने बयान में कहा है कि भारत की सुरक्षा के मद्देनजर यह जरूरी है कि अफजल व कसाब जैसे जेहादी आतंकी जो कि भारत की जेलों में बैठकर उदारवादी न्यायिक प्रक्रिया व प्रजातांत्रिक प्रक्रिया का सहारा लेकर अपनी सजा को आगे बढ़वा रहे को तुरंत प्रभाव से उनके अंजाम पर पहुंचा देना चाहिए. उन्होंने कहा है कि जेहादियों ने जिस तरह से आतंकियों को छुड़वाने के लिए कंधार में विमान का अपहरण का सहारा लिया था, ऐसी ही किसी गतिविधि को वे फिर से अंजाम दे सकते हैं. इसलिए ऐसे लोग जो कि पाकिस्तान में बैठकर पाकिस्तान की छत्रछाया में भारत के खिलाफ जंग छेड़े हुए हैं को किसी भी सूरत में उदारवादी प्रजातंत्र व न्यायिक व्यवस्था का लाभ नहीं देना चाहिए अब तो शीर्ष अदालत ने ही फांसी की सजा पर अपनी मुहर लगा दी है.

कोडनानी समेत 32 दोषी करार

अहमदाबाद. गुजरात की एक विशेष अदालत ने राज्य में 2002 के दंगों के दौरान नरोदा पाटिया मुहल्ले में नरसंहार के लिए भारतीय जनता पार्टी की एक पूर्व मंत्री सहित 32 लोगों को बुधवार को दोषी करार दिया.

स्पेशल कोर्ट ने 29 आरोपियों को हिंसा के इस मामले में बरी भी कर दिया. पूर्व मंत्री व भाजपा की तत्कालीन विधायक मायाबेन कोडनानी और बजरंग दल के नेता बाबू बजरंगी, दोषी ठहराए गए लोगों में शामिल हैं. न्यायालय ने मामले में 29 लोगों को बरी कर दिया. ज्ञात हो कि नरोदा औद्योगिक क्षेत्र में 28 फरवरी, 2002 को कुल 97 लोगों को जघन्य तरीके से मार डाला गया था. इस नरसंहार में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए थे. इसमें हत्या एवं साजिश की धाराएं भी शामिल थीं. इन मामलों में अधिकतम मृत्युदंड सुनाया जा सकता है. गौर हो कि गोधरा कांड के बाद गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान नरौदा पाटिया में एक ही समुदाय के 97 लोगों की हत्या कर दी गई थी. इससे पहले, गुजरात दंगों के करीब 10 साल बाद नरोदा पाटिया के दंगा पीडि़तों के लिए इंसाफ का इंतजार और लंबा हो गया था और स्पेशल कोर्ट ने सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला 29 अगस्त तक सुरक्षित रख लिया था.

नरोदा पाटिया मामले में 62 लोगों को अभियुक्त बनाया गया है. आरोपियों में से एक की मौत ट्रायल के दौरान ही हो गई थी. गोधरा में 27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में हुए अग्निकांड के अगले ही दिन विश्व हिंदू परिषद के बंद दौरान नरौदा पटिया में बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए थे और उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों पर हमला किया. इस वारदात में 97 व्यक्ति मारे गए थे, जबकि 33 अन्य घायल हुए थे. नरौदा पटिया कांड की सुनवाई अगस्त, 2009 में शुरू हुई थी और 62 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय हुए थे. सुनवाई के दौरान ही एक आरोपी विजय शेट्टी की मृत्यु हो गयी थी. इस मामले में 327 लोगों की गवाही हुई है.

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