प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह का यह कथन कि विपक्ष सरकार को अस्थिर कर मध्यावधि चुनाव चाहता है और उनकी सरकार में मंत्रियों में टकराव न होकर एकता है- एक सामान्य-सा राजनैतिक विचार है. इससे उस विवाद पर कोई सफाई नहीं आती जो चिट्ठी 2 जी स्पेक्ट्रम पर केन्द्रीय वित्त मंत्रालय की ओर से प्रधानमंत्री को भेजी गई थी. यह पत्र वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी की रजामंदी से मंत्रालय ने लिखा था. पत्र में प्रधानमंत्री को सूचित किया गया था कि 30 जनवरी 2008 को तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा से मीटिंग में तत्कालीन वित्तमंत्री श्री चिदम्बरम ने उन्हें पुरानी दरों पर स्पेक्ट्रम बेचने की इजाजत दी. जबकि ज्यादा कीमत पर नीलामी की जा सकती थी. वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने ग्रोथ के अनुपात में फीस तय करने की बात की थी. मंत्रालय 4.4 मेगाहट्र्ज से ऊपर के स्पेक्ट्रम बाजार भाव में बेचना चाहता था. ए. राजा इससे सहमत नहीं थे और उन्होंने सीमा 6.2 मेगाहट्र्ज कर दी और श्री चिदम्बरम उस पर मान गये.

यह चिट्ठी श्री विवेक गर्ग ने सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त कर ली और सुब्रमनियम स्वामी ने इसे सुप्रीम कोर्ट में पेश कर श्री चिदम्बरम के विरुद्ध सी.बी.आई. से जांच कराने की मांग की है. सी.बी.आई. ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा है कि जांच कैसे व किसकी की जाए, इस मामले में सी.बी.आई. को सरकार या कोर्ट कोई निर्देश नहीं दे सकते. सी.बी.आई. केन्द्रीय सतर्कता आयोग के अंतर्गत उसकी निगरानी में है, लेकिन सी.वी.सी. भी उसे जांच के तौर-तरीकों पर निर्देश नहीं दे सकता.

प्रधानमंत्री इस नये विवाद पर कुछ न बोलकर यह बोल रहे हैं कि यह मामला अदालत में है और उनका कुछ भी कहना वांछनीय नहीं होगा. वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने यह स्पष्टï कर दिया है कि वित्त मंत्रालय की चिट्ठी में उनकी भूमिका नहीं है, लेकिन इसमें जो भी तथ्य है उन्हें गलत ठहराना मुश्किल है.

इसी समय ए. राजा ने सी.बी.आई. अदालत में यह मांग की है कि श्री चिदम्बरम को गवाह के रूप में बुलाया जाए, क्योंकि स्पेक्ट्रम फैसलों में चिदम्बरम की सहमति थी.
इसी तारतम्य में सी.बी.आई. ने कोर्ट से ए. राजा और दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहरा के विरुद्ध धारा 409 लगाने की अनुमति मांगी है जिसमें आजीवन कारावास का प्रावधान है. सी.बी.आई. ने राजा से पूर्व के द्रमुक के ही संचार मंत्री श्री दयानिधि मारन पर धोखाधड़ी का आरोप लगा दिया कि उनके निवास पर 323 टेलीफोन लाइनें थीं जो भूमिगत केबिल के जरिये उनके भाई के चैनल सन टीवी से जुड़ी थीं. ये सभी लाइनें बी.एस.एन.एल. के जनरल मैनेजर के नाम पर थीं. ये महंगी आई.एस.डी.एन. लाइनें थीं जो बहुत ज्यादा डाटा भेजने में सक्षम होती हैं.

इन संदर्भों में इस बात को बार-बार दोहराने का कोई औचित्य नहीं है कि प्रधानमंत्री श्री मनमोहन व्यक्तिगत तौर पर बहुत ही पाकसाफ व ईमानदार व्यक्ति हैं. यहां मामला व्यक्तिगत ईमानदारी का नहीं है. सवाल यह है कि उनकी सरकार कितनी पाकसाफ व ईमानदार है. 2 जी. स्पेक्ट्रम व राष्ट्र मंडलीय खेल में बड़े घपले-घोटाले हैं. राजा व कलमाड़ी जेल में पहुंच चुके हैं. लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि मनमोहन सिंह सरकार में ही इन्हें जेल भेजा गया है. मामले अदालत में चल रहे हैं. प्रधानमंत्री ने इन मामलों को दबाया नहीं है. लेकिन इनको उजागर और निर्णायक करने में विपक्ष की सक्षम भूमिका है. ट्रायल कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इन मामलों की तह तक जा रहे हैं.

इन घपलों की विवेचना में सी.बी.आई. की अहम भूमिका है. वह सरकारी विभाग है और अदालतों के निर्देशों पर सीधे उनकी मोनीटरिंग में भी काम कर रहा है. सरकार व कोर्ट के निर्देशों में वह अपनी स्वायत्तता को भी बरकरार रखने का संघर्ष कर रहा है कि जांच कैसे की जाए. इस बार उसे कोई निर्देश नहीं दिये जाने चाहिए. यह उसके विवेक व स्व-निर्णय का प्रश्र है. सी.बी.आई. भूमिका गहन व व्यापक हो चुकी है. इसे विभाग के स्थान पर अब संवैधानिक संस्था का दर्जा दे दिया जाना चाहिए.

संस्थापक: स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक: श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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