आधुनिक टीवी, सीडी, टेप, डीजे के आगे ढोलक की लोकप्रियता घटी

सिवनी मालवा 4 दिसंबर नससे. ढोलक की थाप अक्सर नगर हो या ग्राम सभी जगह सुनने को मिलती जाती थी परन्तु आधुनिकता के चलते  परम्परागत वाद्य यंत्रों की आवाज कम होती जा रही है. पुराना सस्ता ओर सुलभ मिलने वाला वाद्य यंत्र ढोलक भी अब कभी कभार सुनने को मिलती है.

पुराने जमाने में ढोलक आकर्षण का केन्द्र होती थी ढोलक के विना कार्यक्रम सम्पन्न नहीं किए जाते थे. ढोलक की थाप अक्सर शादी-विवाह, भजन, कीर्तन, रामायण आदि में सुनने को मिलती थी  हर-एक जस्न के मौके पर ढोलक का महत्ब बहुत अधिक देखने सुनने को मिलता था वहीं शहरों सहित वनॉचलों में भी नाच कूद करते हुए मिल जाते थे वनॉचलों में ढोलक की थाप पर वनवासियों के पैर थरथराते देखे जाते थे परन्तु टीवी, मोवाईल, डीवीडी, डीजे, टेप आदि के कारण ढोलक की लोकप्रियता घटती जा रही है तभी तो ढोलक वनाने वाले परम्परागत व्यवसायियों के द्वारा गांव गांव नगर नगर घूम घूम कर ढोलक बेचकर अपने परिवार का पालन पोषण करने के साथही ढोलक के प्रति जागरूक कर रहे है वैसे से ग्रामीण अचलों में ढोलक आज भी अति महत्वपूर्ण मानी जाती है.

सिवनी मालवा नगर में भोपाल से आकर ढोलक बनाकर बैचने वाले नाशिर पिता महबूव ने वताया कि मैं अपने छह साथियों इसरार शमीर आदि के साथ ढोलक बनाकर बैच रहा हू. नाशिर ने अपनी पीड़ा बतलाते हुए कहा कि यह हमारा पुस्तेनी व्यवसाय है आधुनिकता के दौर में ढोलक की मांग बहुत कम हो गई है अव तो हमे एक स्थान से गांव गांव में घूमकर ढोलक बैचना पढ़ रहा है. आज के समय मे सिर्फ बच्चो के मनोरंजन का साधन रह गया है. पहले के जमाने में ढोलक का महत्व ही कुछ ओर था. नाशिर ने वताया कि ढोलक के शौकीन कम है परन्तु हम दिनभर में करीव एक दर्जन ढोलक बनाते है जिसमें से पॉच सात ढोलक बिकती है जिसमें बामुश्किल जीवन यापन होता है आज के समय में मंहगाई के कारण खर्च वहुत आता है. उन्होंने वताया कि सौ रूपये से लेकर एक हजार रूपये तक की ढोलक बेच रहे है. छोटी ढोलक तो बिक जाती है. परन्तु बड़ी ढोलक हजार आठ सौ रूपये सुनकर लौग पीछे हट जाते है वडी ढोलक कार्यक्रमों में आज भी सुनने को कम ही मिलती है ओर इसके खरीददार भी कम मिलते है.

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