भोपाल, 18 सितंबर. माताएं अपनी कोख से देवताओं को जन्म दें. इसके लिये माता अदिति के पद चिन्हों पर चलें. यह आज की माताओं को तय करना है कि वे आदिति की तरह देवता संतान को जन्म देना चाहिती है या दिति की तरह राक्षसों को.

यह संदेश अखण्ड पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी शाश्वतानंद महाराज ने मानस भवन में पितरमोचनी भागवत कथा की छठवीं संध्या पर व्यक्त किये. उन्होंने सृष्टि की रचना के संदर्भ में आध्यात्मिक व वैज्ञानिक आधार पर सारगर्भित व्याख्या की.

स्वामीजी ने श्रीमद् भागवत कथा के आधार पर बताया कि ब्रम्हाजी ने अपनी रचना के तहत मनु और शत रूपा के रूप में स्त्री तथा पुरुष की रचना की इसके उपरांत मनु ने कहाकि आप मानव रचना की जो बात कह रहे है वह बिना पृथ्वी के संभव नहीं है. इसके लिये रसातल में पड़ी पृथ्वी को बाहर लाने में ब्रम्हाजी ने ईश्वर आव्हान किया और उन्हें जब छींक आयी तो भगवान वाराह का प्राकट्य हो गया जिन्होंने रसातल में हिरणकश्यप एवं हिरणाक्ष जैसे भीषण राक्षसों से युद्घ किया और पृथ्वी को अपने थूथन के ऊपर रखकर बाहर निकले.

यानि भगवान वाराह ने पृथ्वी की श्रेष्ठïता को सिद्घ किया. स्वामी जी ने बताया कि कश्यप ही कश्यक है जो स्वयं दृष्ट है जो शुद्घ बुद्घि चेतन हैं. उन्हीं कश्यप की दो पत्नियां दिति एवं अदिति थी. इनमें दिति स्वभाव से ही भेद बुद्घि, फूट डालने वाली और प्रपंची थी, जिसकी जितनी भीसंतान हुई वह सब राक्षस निकली, जबकि अभेद बुद्घि वाली और सबका कल्याण सोचने वाली दिति से उत्पन्न सभी संताने देवता हुई. स्वामीजी ने कहाकि यह सारी सृष्टिï विलक्षण है और इसमें सब कुछ सत चित आनंद है. यह जगत पंचतत्व से बना है. आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी यह पंच महाभूत है. जिससे सृष्टिï संचालित है.भागवत कथा के प्रारंभ में वरिष्ठï साहित्यकार कैलाशचन्द्र पंत, पदम बरैया, आर.एस.एल. यादव, सुभाष अत्रे, जानकी देवी, राजेश वर्मा, सोनी ओमप्रकाश शास्त्री, काशी विद्यापीठ के प्रोफेसर राममनोहर पाठक आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया.

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