असम में बोडो- बंगलादेशी हिंसा पर मुंबई में हिंसा भड़क उठी. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. इससे पूर्व कानपुर में डॉक्टर अंबेडकर की मूर्ति को अपमानित किया गया और मुंबई के दादर उपनगर में रिपब्लीकन पार्टी ने भारी हिंसात्मक आंदोलन कर डाला. आंदोलन चलाने वाले भी इस बाद्घता में आ गये हैं कि अब यह मान लिया गया है कि उसी को आंदोलन और उसकी सफलता माना जायेगा, जिसमें जितना ज्यादा पथराव, वाहनों व दुकानों की तोड़ फोड़ व लूटमार होगी. कई नयी मान्यतायें भी बदलकर नया रूप ले रही हैं. आमतौर पर लाश को बहुत गंभीरता, शोक व सम्मान के साथ उठाकर ले जाया जाता है, लेकिन अब लाश को सड़क पर रख कर आंदोलन किया जाता है.

सरकार से मृतक का मुआवजा मांगा जाता है. जाहिर है रुपया तो मृतक को मिलेगा नहीं, ‘लाश पर लाभान्वित कोई और होंगे. ऐसे मुआवजे के लिये ज्यादा से ज्यादा मुआवजा पाने के लिये आक्रोश व हिंसा भी करनी पड़ती है. जो लोग इसका प्रबंध करते हैं, वह भीड़ जुटाने का भाड़ा और मुआवजे में से कमीशन भी लेते हैं.  मुंबई में ऐसी घटनाओं पर हिंसा हो रही है, जिसका मुंबई व महाराष्ट्र सरकार से कोई लेना देना नहीं है. ऐसी हिंसा व आंदोलन वही लोग करा देते हैं, जो ऐसी भीड़ व हिंसा किराये पर देते हैं. आजकल रैलियों, प्रदर्शनों, आंदोलन के लिये भीड़ जुटाने का काम कुछ पेशे के तौर पर करते हैं. भीड़ और हिंसा दोनों भाड़ïे पर मिलती है.

अब भीड व हिंसा व्यापारिक प्रचार प्रसार का साधन भी है. फिल्मी कलाकार राजा बुंदेला, जो इन दिनों अन्ना व बाबा टीम से जुड़े हैं. उन्होंने एक फिल्म ‘प्रथाÓ बनाई. भोपाल आकर उन्होंने कुछ प्रमुख राजनैतिक दलों के युवा संगठनों को किराये पर लिया कि वे उनकी फिल्म के विरुद्घ आंदोलन व तोडफ़ोड़ करें, जिसमें फिल्म की पब्लीसिटी हो जाये और फिल्म चल जाये. भोपाल पुलिस ने इस साजिश का पर्दाफाश कर दिया और उन पर मुकदमें ठोक दिये. सड़कों पर लगाई गयी मूर्तियों को कालिख पोतना आदि की घटनायें वे ही लोग करते हैं, जिन्हें कोई भड़काऊ आंदोलन करना होता है. क्या शासन के लिये यह संभव व व्यवहारिक है कि हर मूर्ति पर पुलिस का पहरा तैनात रहे.

अभी कुछ समय पूर्व लंदन में एकाएक हिंसा भड़क उठी और बड़ी दुकानों में लूटपाट की गई. ऐसी बड़़ी दुकानों में सीसी-टी.वी. कैमरे  थे. जिनमें कईयों की शिनाख्त हो गई और पकड़ गये. ये सब युवा और संपन्न घराने के लड़के-लड़कियां थे. इन्होंने कास्मेटिक, कपड़़े व जूते सबसे ज्यादा लूटे. लंदन की पुलिस ने फौरन कार्यवाही कर काफी माल बरामद किया. लंदन की अदालतें सारी रात चली और इन सभी लोगों को उसी दिन सजा भी हो गई.
अब देश की राजनीति का न सिर्फ अपराधीकरण हुआ है बल्कि भाड़ाकरण भी हो गया है. टेंट हाउस और मेरिज गार्डन की तरह कई गुंडो-अपराधियों ने आंदोलन हाऊस भी चला रहे है. जहां हर चीज भीड़, पोस्टर, पुतले, नारे लगाना, गजरे पहनाना, पथराव करना, भारी हिंसा करना आदि-आदि किराये पर उपलब्ध है.

मुंबई में असम हिंसा पर एक मुस्लिम संगठन रजा अकादमी ने 50 हजार मुसलमानों की भीड़ विरोध सभा के लिये आजाद मैदान में इकट्ठा कर ली. जिस तरह की सभा थी उसमें भाषण व संवेदना प्रगट होनी थी. उसमें एकाएक भारी हिंसा ”जिहादी” तर्ज पर फैला दी गई. कहने को तो यह एकाएक हुआ लेकिन यथार्थ यह है कि सब उन्होंने पहले से ”प्लान” किया हुआ था. उसमे भारी हिंसा हुई. इसलिए उसका देश भर में चर्चा गया. और इसी को उस आंदोलन की सफलता माना जा रहा है. मुसलमानों को भी यह लग रहा है कि उन्होंने अपना मकसद पूरा कर लिया. अगर यह न होता वह सभा मुंबई नगर की स्थानीय खबर ही होती. देश के प्रजातंत्र, गंभीर राजनीति और कानून व्यवस्था के लिये अब यह चुनौती बन गया है कि हिंसा, तोडफ़ोड़, लूटपाट को आंदोलन का अनिवार्य अंग मान लिया गया है. इस बेजा चुनौती को अब शासन को भी चुनौती के रूप में लेना चाहिए और हिंसक आंदोलन का भी पुलिस की ताकत व शक्ति लाठी-गोली से दमन कर देना चाहिए. अन्यथा प्रजातंत्रीय देश में हिंसा लूटमार आये दिन की घटनाएं हो जायेंगी.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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