किसी भी नदी का अस्तित्व ही पानी है, यदि वह जलविहीन है तो वह नदी ही नहीं है. ऐसा लगता है कि कई वन्य पशुओं के समान क्षिप्रा भी अस्तित्व के संकट में आ गई है. एक नदी में दूसरी नदी का पानी डालना संभवत: यह देश या विश्व में केवल क्षिप्रा नदी में ही हो रहा है. लगभग हर तीर्थ की एक नदी होती है और उसके नगर के पर्व में उसी नदी में स्नान करना पर्व का मुख्य कार्य होता है. उसमें स्नान के बाद अन्य पूजा-पाठ होता है. उज्जैन कुंभनगर है और उसमें क्षिप्रा स्नान का विधान है. लेकिन पानी ही न हो तो स्नान कैसे किया जाए. क्षिप्रा में खुद का इतना पानी ही नहीं है कि उसमें कुंभ स्नान सम्पन्न हो सके इसलिए एक अर्से से उसमें दूसरे जल स्रोतों से पानी लाकर पïर्व के अवसर पर डाला जाता है. क्षिप्रा दान के पानी की नदी बन चुकी है.

आगामी कुंभ के लिए मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने यह व्यवस्था की है कि नर्मदा-क्षिप्रा सिंहस्थ लिफ्ट योजना के जरिए बड़वाह के निकट ओंकारेश्वर नहर से नर्मदा का 10 क्यूसेक जल लिफ्ट पद्धति से उज्जैन के समीप क्षिप्रा में डाला जायेगा इस पर 432 करोड़ रुपयों का भारी खर्च आ रहा है. हर नदी उद्गम में एक धार होती है लेकिन आगे चलकर सहायक नदियां, नाले उसकी धार को धारा में विकसित कर देते हैं. नदी मार्ग के जल स्रोतों का समूह होती है.

भारत नदियों का देश है यहां की नदियां क्षिप्रा सहित पावन व पूज्यनीय भी हैं. हमारी गाय भी पावन व पूज्यनीय है. लेकिन भारत में नदियों व गायों की जितनी दुर्दशा है उतनी अन्य किसी देश में नहीं है. वहां की नदियां व गाय की नस्लें हमसे कहीं ज्यादा उन्नत हैं. हम विदेशों से गाय की नस्लें ला रहे हैं और क्षिप्रा में दूसरी नदियों से पानी ला रहे हैं. क्षिप्रा का दुर्भाग्य यह है कि इसकी लगभग 13 सहायक नदियां अतिक्रमण के कारण खेत बन चुकी हैं. सहायक नदियों के अभाव में कोई भी नदी क्षिप्रा की तरह जलविहीन हो जायेगी. राज्य शासन का यह कर्तव्य हो जाता है कि राजस्व रिकार्ड में क्षिप्रा की जितनी भी सहायक नदियां दर्ज हैं उन्हें पुन: सहायक नदियों के रूप में लाया जाए.

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