नसीरुद्दीन शाह को खेद है कि ‘द ब्लूबेरी हंट’ नामक फिल्म स्वीकार करने के कारण वे शोएब मंसूर की ‘बोल’ नहीं कर पाए. प्राय: कलाकार फिल्मों के चुनाव में गलती कर जाते हैं और इसके लिए उन्हें दोष भी नहीं दिया जा सकता, क्योंकि निर्माण के प्रथम दौर में आकलन कठिन हो जाता है. कुछ कथाएं रोचक ध्वनित होती हैं, परंतु उन पर उबाऊ फिल्म बन जाती है, क्योंकि यह माध्यम निर्देशक का है, लेखक का नहीं, जिसकी कथा सुनकर चुनाव करना पड़ता है.

दिलीप कुमार को ‘बैजू बावरा’ और ‘जंजीर’ अस्वीकृत करने का खेद रहा है. कभी-कभी सही सलाह मिलने पर गलती करने से बच जाते हैं. सलीम साहब के इसरार करने पर संजीव कुमार ने ‘त्रिशूल’ स्वीकार की, क्योंकि अमिताभ बच्चन और शशिकपूर जैसे यथार्थ जीवन में हमउम्र कलाकारों के पिता की भूमिका करने में उन्हें संकोच हो रहा था. उन्हें समझाया गया कि कथा पिता और उस स्त्री कीहै, जिससे उसने परिस्थितिवश वादा खिलाफी की थी.
बहरहाल, नसीरुद्दीनशाह और ओम पुरी बहुत पुराने मित्र हैं. उन्होंने अभिनय प्रशिक्षण और संघर्ष साथ-साथ किया है.

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