सरकार राज्यसभा में हारना नहीं चाहती थी इसलिए उसने लोकपाल विधेयक को अनिश्चित काल के लिये लटका दिया. संभव है आगामी वर्ष प्रारंभ होने वाले बजट सत्र में पेश किया जाए. यह विधेयक भी भारत की राजनीति और संसद में शगूफा बन गया है. अन्ना हजारे के नेतृत्व में 5 सदस्यों की एक स्वयंभू टीम ने अन्ना के अप्रैल के अनशन पर यह मान लिया कि पूरा देश उनके साथ है और उन्होंने सरकार व संसद दोनों को आदेश, निर्देश व चेतावनी देना शुरु कर दिया. सरकार के साथ संयुक्त समिति में बैठकर कहा कि ऐसा विधेयक बनाओ. संसद को निर्देशित किया कि शीतकालीन सत्र में इसे पारित होना ही चाहिए, अन्यथा फिर अनशन पर बैठ जाऊंगा. दिसम्बर में मुम्बई में अनशन पर बैठ भी गये और दूसरे दिन उठ भी गये. इधर अन्ना ने दिन में अपना अनशन अनिश्चित या संभवत: हमेशा के लिये लटका दिया. उधर रात में सरकार ने लोकपाल विधेयक को राज्यसभा में लटका दिया. दोनों की किरकिरी और भद हो गई. विपक्ष की पार्टियों का कुछ ऊंचा खेल हो गया. उन्होंने लोकसभा में इस पर संविधान संशोधन गिराकर सरकार की जीत को आधी हार में बदल दिया और राज्यसभा में पूरी हार देने के लिये कमर कस के खड़े हो गये.

संसद में मनमोहन सिंह सरकार भी असहज व अड़चन की स्थिति में है. लोकसभा में उसके पास केवल साधारण बहुमत है और वह साधारण विधेयक ही पारित करा सकती है. संविधान संशोधन की ताकत उसके पास नहीं है. राज्यसभा में वह संयुक्त विपक्ष के सामने अल्पमत है. उच्च सदन में तो विपक्ष का नेता वास्तव में बहुमत का नेता हो जाता है. अन्ना हजारे भी यह कहकर खामोश हो गये कि संसद में जो कुछ हो रहा है वह दु:खद है. पहले की तरह उन्होंने हुंकार नहीं भरी कि ऐसा करो नहीं तो ऐसा कर दूंगा. संसद के भाषणों में कई पक्षों ने यह कई बार कहा कि यह अन्ना और उसकी टीम है क्या जो डांट-फटकार के लहजे में बात कहते हैं. इन्होंने स्वयं अपने आपको नियुक्त कर लिया है. यह किसके प्रति जवाबदेय है. मुम्बई अनशन के समय जन-समर्थन व जन उन्माद के भारी अभाव में शायद इन लोगों का यह नशा भी काफूर हो गया है कि पूरा देश उनके साथ खड़ा है. अब अन्ना फिलहाल विधानसभा वाले 5 राज्यों में कांग्रेस के विरुद्ध प्रचार करने की घोषणा कर चुके हैं और यह इरादा भी जाहिर कर दिया है कि इन चुनावों के बाद भी वे देश भर जाकर कांग्रेस के विरुद्ध प्रचार आगामी लोकसभा चुनाव 2014 तक जारी रखेंगे. मुम्बई में तो उनके इर्द-गिर्द भीड़ जुटी नहीं, अब देखा यह जायेगा कि चुनाव सभाओं में कितनी भीड़ जुटती है या उसका क्या प्रभाव पड़ेगा. उनका यह प्रचार भी भारत में अपने ढंग का अजूबा ही होगा. इसमें वे किसी पार्टी या उम्मीदवार के लिए वोट नहीं मांगेंगे केवल कांग्रेस को वोट नहीं देने का कहकर नकारात्मक प्रचार करेंगे. हो सकता है वहां जाकर फैसला किसी पार्टी के पक्ष में कर लें.

भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त श्री एस.वाई. कुरैशी ने भी कहा है कि अन्ना के बारे में सतर्क और सजग रहेंगे. संभवत: उन्हें प्रचार के खर्चे का हिसाब चुनाव आयोग को देना ही होगा. वह न तो पार्टी हैं और न ही उम्मीदवार, फिर सवाल यह पैदा होगा कि आयोग उसे कौन सा खर्चा और हिसाब माने. लेकिन इसमें भी लेशमात्र संदेह नहीं है कि अन्ना ने देश में भ्रष्टïाचार के विरुद्ध अलख तो जगा दिया है. अब जिन्न बोतल के बाहर आ चुका है. पेंड्रा बाक्स खुल चुका है. सरकार, संसद व राजनैतिक स्तर पर इसे कमजोर करने या टालने की कितनी भी कोशिश की जाए पर इस मसले को निर्णायक स्थिति तक पहुंचाना ही पड़ेगा. अब भ्रष्टïचार सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों तक सीमित नहीं है. वह चपरासी से लेकर केंद्र सरकार में 2 जी स्पेक्ट्रम के राष्ट्र मंडल खेलों तक पहुंच गया है. रिश्वतखोरी और सभी तरह का भ्रष्टïचार सरकारी कामों और राजनैतिक आचरण में आचार-विचार व व्यवहार बन चुका है. वास्तविकता में अन्ना हजारे भ्रष्टïचार के मामले में देश को झकझोरने में पूरी तरह सफल रहे हैं इसके लिए राष्ट उनका ऋणी और आभारी है. अन्ना नहीं उठते तो संसद में इतना भी नहीं होता. 1968 से 43 साल से यह विधेयक वहां लटका कर वापस ले लिया गया था. इसी तरह महिला आरक्षण विधेयक पर भी घृणित राजनीति से उसे अभी लटकाये हुए है. इस बार संसद में लोकपाल विधेयक को लटकाना कोई नई बात नहीं हुई है.

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