लोकपाल विधेयक 43 साल के बाद लोकसभा में ध्वनिमत से पारित तो हो गया, लेकिन इसकी प्रतिध्वनि (Echo) शोर बन गई है. इस वक्त इसकी हालत यह है कि यह ‘न मेरा- न तेरा और न उसका’ का हो गया है. सवाल यह है कि फिर यह है किसका? लोकसभा में सरकार के पास सामान्य बहुमत  (Simple Mejority) है. उसके पास दो तिहाई बहुमत नहीं है इसलिये वह बिना विपक्ष के सहयोग के कोई भी संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं करा सकती. लोकपाल पर यही हुआ कि सामान्य बहुमत से सरकार ने विधेयक तो पास करा लिया, लेकिन उसे दो तिहाई के अभाव में संवैधानिक दर्जा देने का विधेयक पास नहीं करा सकी. यह व्यवस्था कांग्रेस सांसद श्री राहुल गांधी के सुझाव पर की गई थी. सरकार इस विधेयक पर जीती भी है और हारी भी है.

विपक्ष के अधिकांश दल प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी सहित यह चाहते थे कि सरकार विधेयक वापस ले ले और इसे पुन: संसद की स्थाई समिति को विचारार्थ भेज उनके विचारों के अनुरूप संशोधन किया जाए. लेकिन सरकार के सामान्य बहुमत के कारण वह विधेयक पास होने से रोक नहीं सके, लेकिन संविधान की व्यवस्था के अनुसार उसे संवैधानिक दर्जा नहीं मिलने दिया. इधर संसद में विधेयक पर बहस प्रारंभ हुई, उधर मुम्बई में अन्ना हजारे ‘कमजोर’ लोकपाल विधेयक के विरोध में ममरडा मैदान में अनशन पर बैठ गए. वहां उनकी हालत शारीरिक व समर्थन अभाव के कारण खराब हो गई है. उन्हें वायरल बुखार है. शारीरिक गर्मी बढऩे से शरीर में पानी की कमी  हो गया है और उनकी किडनी को खतरा पैदा हो गया है. वे अनशन पर हैं और खाली पेट उन्हें दवाईयां नहीं खिलाई जा सकती हैं. दूसरी ओर उनके समर्थन में जितनी विशाल भीड़ चौबीसों घंटे जन्तर-मन्तर पर जुटती रही है, वह मुम्बई में नहीं है. मैदान भरा कम और खाली ज्यादा है. अन्ना अपने प्रबंधकों को दोष दे रहे हैं कि वे जनता को जुटाने का माहौल व व्यवस्था करने में बुरी तरह असफल रहे हैं. उनके प्रबंधक पुलिस को दोष दे रहे हैं कि वे लोगों को आने नहीं दे रही है.

इस वक्त मुम्बई में जनता की उदासीनता का कारण यह है कि सारे देश की तरह वहां के लोगों का ध्यान संसद में लोकपाल विधेयक की बहस पर है. अन्ना का अनशन बेवक्त की नमाज हो गया है. इस समय हालत यह है कि हालत सरकार, विपक्ष व अन्ना हजारे तीनों की खराब है. सरकार के सामने अब समस्या यह है कि इसे राज्यसभा में तो ध्वनिमत से भी पारित नहीं कराया जा सकता. वहां सरकार के पक्ष में कुल 104 सदस्य और विपक्ष की ओर 114 सदस्य हैं. इससे सरकार की हालत और खराब हो जायेगी. फिर यही विकल्प रहेगा कि संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में इसे पेश किया जाए और वहां पारित कराया जाए. सरकार के लिए एक झटका यह भी रहा कि लोकसभा में मतदान में कांग्रेस के 16 सदस्य गैर-हाजिर हो गये. जबकि तीन लाइनों का अनिवार्य उपस्थिति का व्हिप जारी हो चुका था. सरकार के सामने ‘बड़ी कठिन है डगर पनघट की’ स्थिति है. अन्ना ने जन्तर-मन्तर पर लोकपाल पर जितनी भीड़ जुटाई थी उससे ज्यादा भीड़ लोकपाल पर विचारों की हो गई है. सरकार, विपक्ष व अन्ना तीनों अपने विचारों को मनवाने पर तुले हैं. इसमें ‘अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग’ हो गया है. इस समय तीनों पक्षों को हासिल तो कुछ हो नहीं रहा है, विचारों व जिदबाजी की हड़बड़ी में गड़बड़ी हो रही है. लोकपाल विधेयक कुछ इस तरह बन गया है जैसे ‘बेताबियां समेट कर सारे जहान की- जब कुछ न बन सका तो मेरा दिल बना दिया.’  अभी रास्ता यही नजर आता है कि अन्ना अनशन का तमाशा खत्म और बन्द करे. विधेयक को सामान्य रूप में पारित कर दिया जाए. आने वाली सरकारें जब तक इसमें संशोधन कर सकती हैं, लेकिन फिलहाल इसे कानून बना दिया जाए.

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