मध्यप्रदेश सरकार जैविक खेती को अपनी कृषि नीति घोषित कर चुकी है. इसमें रासायनिक खादों व कीटनाशकों की जगह प्राकृतिक जैविक खादों व कीटनाशकों का उपयोग किया जायेगा. देश में बोरलोग की हरित क्रांति को अपनाने के साथ ही खेती में रासायनिक खादों व रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग शुरू हुआ. आज स्थिति यह है कि रासायनिक प्रक्रिया की खेती पूरे देश की खेती उसी प्रकार बन चुकी है जैसे हमारा देश आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के होने के बाद भी ऐलोपेथी को अपनी चिकित्सा पद्धति बना चुका है और प्राथमिक स्कूलों में भी हिंदी माध्यम की जगह अंग्रेजी माध्यम बढ़ता जा रहा है.

जिस तरह हम स्वदेशी भावना से प्रेरित होकर आयुर्वेद व हिंदी को बढ़ाने की बात कहते हैं उसी तर्ज पर हम जैविक खेती की बात कर रहे हैं. जैसे ऐलोपेथी दवाइयों में ”साइड इफेक्ट” ज्यादा होने की बात सामने आई है उसी तरह रासायनिक खादों से खेती में भूमि की उर्वरकता लगातार धीरे-धीरे कम होने की काम बात आ रही है. आज धारणा भी यह बन रही है कि रासायनिक खादों का अनियंत्रित व गैर जरूरी प्रयोग हो रहा है. इसे नियंत्रित किया जाए. साथ ही जैविक खेती की बात भी बढ़ाई जा रही है. लेकिन मध्यप्रदेश में ही जहां यह राज्य की नीति बना दी गई है, वहां इस दिशा में कुछ दिख नहीं रहा है. मुख्यमंत्री भी हर साल केंद्र से रासायनिक खादों की गुहार लगाते रहते है.

राज्य के कृषि विकास मंत्री श्री रामकृष्ण कुसमारिया ने यह दावा किया है कि देश में मध्यप्रदेश में जैविक कृषि का प्रमाणिक क्षेत्र सबसे अधिक है. जैविक रूपान्तरण और वन क्षेत्र को शामिल करने पर यह लगभग दो तिहाई होगा. इस समय राष्ट के सामने यह प्रश्न नहीं है कि इलाज, शिक्षा व खेती में कौन सी पद्धति अपनायी जाए. सवाल यह है बढ़ती आबादी में जो बम्पर फसलें आ रही है उसकी मात्रा में कमी नहीं आनी चाहिए. यदि जैविक खेती से उपज रासायनिक खादों से खेती में भी ज्यादा आती है तो किसान इसे बड़ी खुशी से आगे बढ़कर उसी तरह अपना लेंगे जैसे उन्होंने पहले रासायनिक खेती को अपनाया है.

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