संसदीय शासन प्रणाली में यदि संसद ही न चलने दी जाए तो फिर इस देश में क्या चलेगा? विपक्ष को सरकार चलाने का अधिकार नहीं है क्योंकि वह अल्प मत होने के कारण जनादेश नहीं है. बहुमत को यह अधिकार है तो उससे यह कहा जा रहा है कि सरकार वह करे जो विपक्ष कह रहा है. इसका अर्थ यह होगा कि सरकार विपक्ष की सरकार ”प्रोक्सी सरकार” के रूप में चलाए.

दूसरी तरफ अन्ना हजारे को देश के दूसरे गांधी होने का और लोकपाल का नशा सवार है. वे चाहते हैं कि सरकार व संसद वैसे लोकपाल विधेयक को पारित करे जैसा वह चाहते हैं और उनकी दी गई समय सीमा में करे. उनके पास कोई जनादेश तो नहीं है- मात्र कुछ व्यक्तियों की एक ”अन्ना टीम” है. लेकिन वह यह दावा कर रहे हैं कि लोकपाल विधेयक पर सारा देश उनके साथ है. सवाल यह है जब उन्हें यह भरोसा हो गया है कि सारा देश उनके साथ है तो वे अगले आम चुनाव में अपनी टीम के साथ उतर जाएं- जनादेश पाकर संसद में बहुमत और सरकार बन ही जायेंगे- फिर जैसा चाहे वैसा लोकपाल कानून बना लें. आज जो सरकार में हैं यदि उन्हें केवल वही और वैसा ही करना है जैसा विपक्ष के दल और अन्ना हजारे कहें तो फिर सरकार खुद क्या करेगी? ऐसी बेतुकी शासन व्यवस्था को संविधान और राजनीति विज्ञान की भाषा में किस तरह परिभाषित किया जायेगा.

अब विपक्ष की कार्यप्रणाली एक ही बची है कि किसी न किसी मुद्दे पर संसद को चलने ही नहीं दिया जाए. संसदीय प्रणाली में दलों की सरकार बदलती रहती है. ऐसी परिस्थितियां यदि भारत में स्थापित हो गईं तो फिर कोई भी सरकार काम कर ही नहीं सकती. क्या यह देश संविधान विहीन अराजकता की ओर जा रहा है. प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह अपने सरकार चलाने के अधिकार पर दृढ़ नजर आ रहे हैं. उन्होंने भी यह स्पष्टï कर दिया कि रिटेल व्यापार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के फैसले को वापस नहीं लिया जायेगा. इस निर्णय में यह व्यवस्था है कि राज्य सरकारें चाहें तो इसे लागू करें या न करें. केंद्र सरकार के पास कहने को तो पूरा देश है पर वह राज्यों की व्यवस्था पर आधारित है. यह फैसला पूरे भारत पर इसलिए लागू नहीं होगा कि वह केंद्र सरकार का फैसला है. मनमोहन सिंह सरकार की यह धारणा है कि यह फैसला देश हित में है. इससे मुद्रा स्फीती रुकेगी और आर्थिक दृढ़ता आएगी. आज विश्व स्तर पर विदेशी निवेशक बहुराष्ट्रीय हो रहे हैं, जिनमेें भारतीय कम्पनियां व निवेशक भी शामिल हैं. देश में विदेशी विश्वविद्यालयों को लाया जा रहा है. अभी तक यहीं के विद्यार्थी विदेशों में पढऩे जाते रहे हैं, जिनमें से अधिकांश इस देश के नेता रहे हैं.

आज राष्ट्रीयकरण सभी जगह इसलिए त्याग दिया गया है कि वह असफल विचारधारा है. सोवियत संघ राजकीय उद्योग व्यापार का जनक रहा है. जब वह ध्वस्त हुआ तो उसने ”कम्युनिज्म” को ही त्याग दिया और लेनिन, माक्र्स स्टालिन तक की मूर्तियां तक उखाड़ फेंकी. आज दुनिया संचार व यातायात के द्रुतगामी युग में बहुत छोटी हो गई है. अब कोई भी राष्ट्र ”बंद” होकर बैठेगा तो ध्वस्त हो जाएगा. अब निवेश का देसी और विदेशी वर्गीकरण नहीं हो सकता. निवेश को अपने शासन तंत्र के कानून व नियमों में या उनके अनुरूप बनाकर लाना ही होगा. देसी और आत्म निर्भर होना बहुत ठीक और अनिवार्य है लेकिन विदेशी निवेशों से क्या भारत के टाटा, रिलायंस, बिड़ला आदि संस्थान प्रतिस्पर्धा में नहीं आ सकेंगे. इन्हें कौन रोक रहा है. विदेशी निवेश से देश का रिटेल कैसे नष्ट हो रहा था क्या हम अपने आप को इतना अक्षम्य और घटिया मान बैठे हैं?

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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