कोयला खदानों के उपखंडों के आवंटन पर संसद में चल रहा अवरोध अब गतिरोध की तरफ बढ़ रहा है. ऐसा ही अवरोध संसद में पहले भी स्पेक्ट्रम पर संसद की जे.पी.सी. बनाने पर आया था. उस समय एक पूरा सत्र अवरोध में व्यर्थ चला गया, लेकिन अगले सत्र में जे.पी.सी. की मांग मान ली गई. यह भी एक विडम्बना है कि उस जे.पी.सी. का कार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ है. हल्ला मचा कर उसे बनवा लिया और वहां काम में गति न होने से उसे गतिरोध ही कहा जा सकता है. अभी उस जे.पी.सी. में ही हल्ला ज्यादा और काम कम की स्थिति बनी हुई है.

लेकिन इस बार का अवरोध संसदीय प्रक्रिया के अलावा राजनैतिक तौर पर भी कठिन मांग व परिस्थिति है. कोयला उपखंडों का आवंटन इसलिये प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह पर आ गया है कि उस समय कोयला मंत्रालय स्वयं प्रधानमंत्री चला रहे थे. संसदीय संस्था सी.ए.जी. ने उसमें घोटाले, राजस्व नुकसान और किन्हीं संस्थाओं को अनुचित लाभ देने की टिप्पणियां की हैं. हर आडिट रिपोर्ट की यह प्रक्रिया होती है कि वह जिस संस्था, विभाग या मंत्रालय का किया जाता है- उसे यह हक होता है कि वह आडिट आपत्तियों का जवाब दें. सी.ए.जी. की रिपोर्ट के बारे में यह संसदीय प्रावधान है कि सरकार उसे जैसा का तैसा संसद में पेश करेगी. संसद की लोक लेखा समिति उस रिपोर्ट का परीक्षण करेगी और सदन बाद में सी.ए.जी. आडिट रिपोर्ट व उस पर संसदीय लोक लेखा समिति की रिपोर्ट पर विचार करेगी. अभी सदन में इस पर प्रारंभिक चर्चा होकर उसे लोकलेखा समिति को भेजा जायेगा.

लेकिन प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी की यह मांग है कि अभी जो सी.ए.जी. की आडिट रिपोर्ट आई है उसी की टिप्पणियों के आधार पर प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दें. इसका अर्थ होगा कि प्रधानमंत्री को उन आडिट आपत्तियों का जवाब देने से पहले ही दंडित कर दिया जाए. यह मांग व प्रक्रिया न्यायोचित नहीं लगती है. इस पर लोकसभा में बहस होने पर ही कोई बात स्पष्टï हो सकती है. लेकिन केन्द्रीय सरकार की ओर से भी इस मामले में अनुचित रवैया बनाया गया. सी.ए.जी. रिपोर्ट आते ही उसे अतिरंजित और वास्तविक स्थिति से परे बताया जाने लगा. यह दावे किये गये कोयला उपखंडों के आवंटन में कुछ भी गड़बड़ नहीं है, सब ठीक है. सरकार को एक संवैधानिक संस्था के दायित्वों की पूर्ति को इस तरह हल्के-फुल्के ढंग से लेकर उसे खारिज करने जैसा दर्शाना भी सरकार के लिये न्यायोचित नहीं कहा जा सकता है.

इस समय सरकार व प्रमुख विपक्ष दोनों ही राजनैतिक बचाव और राजनैतिक प्रहार की स्थिति में आ गये हैं और सी.ए.जी. रिपोर्ट की महत्ता को ऐसे बयानों व अवरोधों से मूल उद्देश्य व विचार से दूर किया जा रहा है. संसदीय बहस से पहले सरकार को इस आडिट रिपोर्ट पर ऐसे बयान नहीं देने चाहिए जैसे वह रिपोर्ट कोई मामूली दस्तावेज हो, जिसका कोई महत्व नहीं है. सी.ए.जी. एक संवैधानिक संस्था है. उसकी उसी के अनुरूप गरिमा व उत्तरदायित्व है. उसे इस तरह से दरकिनार नहीं किया जा सकता है. जिस रिपोर्ट को संसद में पेश किये जाने का प्रावधान है, उस पर संसद में बहस तो करनी ही पड़ेगी. इसमें इस्तीफे की मांग क्यों लादी जा रही है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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