नई दिल्ली, 22 दिसंबर. केंद्रीय कैबिनेट ने गुरुवार को अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण का रास्ता साफ कर दिया. अब पिछड़े वर्गों के लिए तय 27 फीसदी आरक्षण में साढ़े चार फीसदी हिस्सा अल्पसंख्यकों का होगा. उधर, बीजेपी ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया है तो बीएसपी ने सरकार की नीयत पर सवाल उठाया है. उसका आरोप है कि यूपी चुनाव को देखते हुए ये फैसला किया गया है.

दरअसल भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से घिरी सरकार ने अपने जनाधार को बढ़ाने की कोशिशें तेज कर दी हैं. गुरुवार को दिन में भोजन का अधिकार देने वाले बिल को संसद में पेश करने वाली सरकार ने शाम को शिक्षा संस्थानों और नौकरी में अल्पसंख्यकों के आरक्षण का रास्ता साफ कर दिया. शाम को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में फैसला किया गया कि अल्पसंख्यकों को साढ़े चार फीसदी आरक्षण दिया जाएगा. ये आरक्षण पिछड़ों के लिए निर्धारित 27 फीसदी कोटे के अंदर होगा. जाहिर है कि ये आरक्षण पिछड़ी जाति के अल्पसंख्यकों को मिलेगा. लेकिन चुनावी बिसात पर इस फैसले का मतलब सिर्फ मुसलमानों को लुभाना माना जा रहा है, जो बीजेपी को कतई रास नहीं आया है. वहीं यूपी में सत्ता बचाने को परेशानी बीएसपी इसे कांग्रेस का चुनावी दांव मानने से ज्यादा कुछ मानने को तैयार नहीं है. कुछ साल पहले रंगनाथ मिश्र आयोग ने मुसलमानों की हालत को बेहतर करने के लिए आरक्षण की सिफारिश की थी. लेकिन संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण देने की इजाजत नहीं देता. इसलिए पिछड़े वर्ग की सूची में अल्पसंख्यकों को आरक्षण देकर मुसलमानों को लाभ देने की कोशिश की गई है. पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव जल्दी ही होने हैं. इनमें यूपी का चुनाव, कांग्रेस के भविष्य के लिए काफी अहम माना है. और पार्टी को उम्मीद है कि इस फैसले के बाद वो मुसलमानों के बीच सिर उठाकर समर्थन मांगने जा सकती है.

एसटी दर्जा देने संबंधी विधेयक को मंजूरी

नई दिल्ली. सरकार ने बृहस्पतिवार को कहा कि वह नहीं चाहती कि देश में आरक्षण के लिए एक ही जाति को विभिन्न राज्यों में अलग-अलग दर्जा प्राप्त हो और इसके लिए वह राज्यों के साथ विचार-विमर्श के लिए एक राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाएगी. जनजातीय मामलों के मंत्री किशोर चंद्र देव ने राज्यसभा में संविधान [अनुसूचित जनजातिया] आदेश [संशोधन] विधेयक पर हुई चर्चा के जवाब में यह बात कही. चर्चा के बाद सदन ने इस विधेयक को ध्वनिमत से मंजूरी दे दी.

लोकसभा में यह पहले ही पारित हो चुका है. विभिन्न जातियों का दर्जा तय करने के लिए एक व्यापक विधेयक लाने की विभिन्न दलों की माग पर मंत्री ने कहा कि हम अभी ऐसा करने की स्थिति में नहीं हैं. इसके लिए मंडल आयोग जैसा कोई आयोग गठित करने के विपक्ष के सुझाव पर उन्होंने आश्वासन दिया कि सरकार इस पर विचार करेगी. देव ने यह भी स्पष्टीकरण दिया कि मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में होने जा रहे विधानसभा चुनाव को ध्यान में रख कर यह विधेयक नहीं लाया गया है. संविधान संशोधन विधेयक के जरिए मणिपुर के छह समुदायों इनपुई, रोंगमई, लियागमई, जेमे, थगल और मेट को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने का प्रस्ताव है. साथ ही अरुणाचल प्रदेश के अनुरोध पर अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल ‘गालंग’ समुदाय की जगह ‘गालो’ को सूचीबद्ध किया जाएगा. गालंग शब्द गालो का विकृत रूपान्तर है. देव ने कहा कि किस समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाना है और किसे नहीं, इसका फैसला सरकार नहीं कर सकती, बल्कि इसके लिए कुछ मानक हैं. इसके लिए समुदायों की अपनी अलग संस्कृति होनी चाहिए, भौगोलिक दृष्टि से वह अलग थलग हों, मुख्यधारा से लगभग कटे हुए हों और पिछड़े हों.

राज्य सरकारें इन तथ्यों से अच्छी तरह अवगत होती हैं कि उनके यहा कौन सा समुदाय इस तरह का है. कई सदस्यों की अपने राज्यों के विभिन्न समुदायों को अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने की माग पर मंत्री ने कहा कि इसके लिए सिफारिश राज्य सरकारों की ओर से आनी चाहिए. उनकी ओर से मिली तथ्यों और आकड़ों पर आधारित सिफारिश भारत के महापंजीयक के पास भेजी जाती है. वहा से अनुमोदन मिलने के पास सरकार वह सिफारिश राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के पास भेजती है और तब प्रस्ताव मंत्रालय के पास आता है. मंत्री ने कहा कि महापंजीयक द्वारा आपत्ति जताने के बाद प्रस्ताव एक बार फिर राज्य सरकारों के पास भेजा जाता है. उन्होंने कहा कि विभिन्न राज्यों से अलग-अलग समुदायों को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने की सिफारिशें मिली हैं. कुछ पर विचार जारी है और कुछ को महापंजीयक की आपत्ति जताने के बाद वापस राज्यों के पास भेजा गया है. बहरहाल, उन्होंने माना कि समुदायों के उच्चारण में कुछ विसंगतिया हो सकती हैं लेकिन प्रक्रियाओं का पालन करना होगा. उन्होने कहा कि कर्नाटक में मेघा समुदाय को अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने की माग की जा रही थी. इसे मंजूरी दे दी गई है, लेकिन इस संबंध में अभी प्रक्रिया जारी है. मंत्री ने समुदायों को अनुसूचित जाति में राष्ट्रीय आधार पर शामिल किए जाने की माग से सहमति जताई लेकिन यह भी कहा कि यह राज्यों का मामला है. समुदायों को श्रेणीबद्ध वे ही करते हैं. इस बारे में केंद्र राज्यों के साथ विचार -विमर्श करेगी और एक राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया जाएगा.

विधेयक पर चर्चा में भाग लेते हुए भाजपा के एस एस अहलूवालिया ने कहा कि देश के विभिन्न राज्यों में कई समुदाय ऐसे हैं जिन्हें एक राज्य में अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त है और दूसरे में नहीं. वर्ष 1950 से कई राज्यों के अलग अलग समुदाय खुद को इसी आधार पर अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल किए जाने की माग कर रहे हैं. धर्मातरण का एक कारण यह भी होता है. उन्होंने कहा कि अनुसूचित जनजाति की सूची में दो बार अद्यतन किया गया लेकिन जनगणना के निष्कर्षो को उपेक्षित कर दिया गया. उन्होंने सभी राज्यों से परामर्श कर उनकी लंबित मागों पर विचार करने तथा एक व्यापक संशोधन विधेयक लाने की माग की, ताकि सभी जनजातियों को सूची में शामिल कर उन्हें आरक्षण का लाभ दिया जा सके. मा?र्क्सवादी तपन कुमार सेन ने कहा कि एक राज्य में अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त लोग अगर दूसरे राज्य में जाते हैं और वहा उन्हें यह दर्जा नहीं मिलता. इससे जातीय समस्या उठती है और इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक समस्या भी बढ़ रही है. सेन ने कहा कि वर्ष 1950 के बाद से हालात में आए व्यापक बदलाव को देखते हुए समग्र और समरूप दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और देश भर की अनुसूचित जनजातियों की भेदभाव रहित सूची बनानी चाहिए. बीजद के प्यारी मोहन महापात्र ने कहा कि उड़ीसा से पूर्व केंद्रीय मंत्री के पी सिंह देव ढेंकानाल के रहने वाले थे और ढेंकासंवर समुदाय के थे. वह कभी उस क्षेत्र के राजा थे, लेकिन आज इस समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला हुआ है. इन विसंगतियों पर विचार कर इन्हें दूर करना चाहिए ताकि वंचितों को उनका हक और लाभ मिल सके. बसपा के एस पी सिंह बघेल ने कहा कि मात्र उच्चारच की गलती के कारण धनगर समुदाय को सरकारी दस्तावेजों में धागड़ लिख दिया गया और यह अत्यंत पिछड़ा समुदाय आरक्षण के लाभ से वंचित हो गया. उन्होंने ऐसी खामियों को दूर करने और धनगर, पाल, बघेल, निषाद, मल्लाह, केवट, धीवर, तमोली, प्रजापति, कश्यप, माझी आदि समुदायों को अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने की माग की.

मनोनीत भालचंद्र मुंगेकर ने घुमंतू जनजातियों को आरक्षण का लाभ दिए जाने की माग की वहीं भाकपा के डी राजा ने कहा कि केंद्र को राज्यों से तमाम आदिवासी समुदायों की सूची मंगवा समीक्षा करनी चाहिए और खामिया दूर करनी चाहिए. भाजपा के केबी शणप्पा ने कर्नाटक में कवलिगा, मेदार, कोली और कुदार समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की माग की वहीं जदयू के प्रो अनिल कुमार साहनी ने बिहार में नुनिया, निषाद, मल्लाह, केवट आदि समुदायों को अत्यंत पिछड़ा बताते हुए उन्हें आरक्षण का लाभ दिए जाने की माग की. चर्चा में राकापा के तारिक अनवर, तृणमूल काग्रेस के डी बंदोपाध्याय, द्रमुक की वासंती स्टेनले, भाजपा के प्रकाश जावड़ेकर, अनुसूइया उइके, रूद्र नारायण पाणि, श्रीगोपाल व्यास, अगप के वीरेंद्र प्रसाद वैश्य, काग्रेस के मैबल रिबेलो, विजय लक्ष्मी साधौ और एमएस गिल ने तथा माकपा के समन पाठक ने भी भाग लिया.

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