डेढ़ सौ कमाने के बाद भी खर्च चलाना है कठिन

जबलपुर. बस स्टेण्ड के समीप चाट का ठेला लगाने वाले रघुनंदन तिवारी का कहना है कि वे प्रतिदिन चाट का ठेला लगाकर 300 रुपये से 500 रुपये के बीच बिक्री करते है, जिसमें समान की खरीदी काटकर उन्हें 150 रुपये की आय से एक दिन का घर खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है. खाद्य सामग्रियों के दाम इतने अधिक है कि मनमाफिक खाना-खाना मुश्किल हो रहा है. खाना पकाने मिट्टी तेल और लकड़ी के लिये जगह-जगह भटकना पड़ता है प्रतिदिन एक दो लीटर मिट्टी तेल 50 रुपये में खरीदते हैं तब यहीं घर में खाना पाता है. योजना आयोग की नई दलील से तो देश में कोई भी गरीब आदमी नहीं कहलायेगा.

इसी प्रकार नगर निगम कार्यालय के सामने हवा-पंचर बनाकर जीवन यापन करने वाले एक नौजवान कालीचरण विश्वकर्मा ने बताया कि दिनों-दिन महंगाई बढ़ते जा रही है. वह बड़ी मुश्किल से 70 से 75 रुपये के बीच सायकल एवं रिक्शों में हवा एवं पंचर बनाकर कमा पाता है. घर में पांच लोगों का परिवार है मां दो बहिन और दो छोटे भाई है जिनकी परवरिश का पूरा दारोमदार उसी के ऊपर है, मां घरों में बर्तन मांजने और झाडू पोंछा का कार्य करती है, बड़ी मुश्किल से हम घर चला पाते है भाई बहिनों को पढ़ाना-लिखाना मुश्किल हो रहा है. 70-75 रुपये प्रतिदिन कमाने के कारण अब हम गरीब की श्रेणी में भी नहीं आ सकते. बीपीएल का राशन कार्ड होने के कारण सस्ते दर पर खाद्यान्न मिल जाता है जिससे भूखा मरने की नौबत नहीं आती नहीं तो बाजार से 15 रुपये किलो चांवल और गेहूं खरीदना मुश्किल हो जाता.

एक निजी बीमा कम्पनी में मूल्य के पद पर कार्य करने वाले रामसहाय गोटिया ने बताया कि वह प्रतिदिन 70 रुपये दिन के हिसाब से कम्पनी में काम करता है उसे 2000 रुपये मासिक के करीब पगार मिलती है. शहर में आकर किराये के मकान में रहता है 600 रुपये मकान किराये के देने पडते हैं बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चल पाता है. गांव में बीबी बच्चे रहते है, जिन्हे 800 रुपये प्रति माह देना पड़ते है. गांव में राशन पानी ले आता है किसी तरह गुजारा हो जाता है.

योजना आयोग की नई दलील से वह गरीब की श्रेणी में नहीं आ पायेगा, अद्यति उसे सरकारी योजनाओं का कोई लाभ नहीं मिल पायेगा.
गढ़ा निवासी निजी स्कूल में शिक्षकीय कार्य करने वाले रत्नाकर पांडे का कहना है कि याजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा प्रस्तुत किया है और उसमें गरीबी निर्धारण को लेकर जो दलीलें दी गई है वे अनुचित है जिसने भी ये दलीलें प्रस्तुत की है उसने गरीबों के सथ भद्दा मजाक किया है.

गरीबी का यह मापन गलत- ग्वालियर. इस मामले में नवभारत ने अर्थशास्त्री और व्यापारी वर्ग से उनकी प्रतिक्रिया ली और सभी ने इस परिभाषा का विरोध किया है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एवं जीवाजी विश्वविद्यालय अर्थशास्त्र विभाग के अध्यक्ष डॉ. एचके शुक्ला कहते हैं गरीबी का मापन करने के लिये तेंदुलकर समिति बनी हुई है इसके मुताबिक गरीबी का मापन देश और प्रदेश की परिस्थितियों पर निर्भर है। जरूरी नहीं है कि एक राज्य जैसी स्थिति दूसरे राज्य की भी हो। इसके लिये 13 मूलभूत आवश्यकताएं मिलने को भी गरीबी का मापन किया जाता है।

हाल ही में योजना आयोग द्वारा जो हलफनामा दिया है उससे श्री शुक्ला कतई सरोकार नहीं रखते। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस तरह गरीबी का पूरे देश में मापन करना पूर्ण रूप से गलत है। इसके लिये क्षेत्रीय मापदण्ड देखना जरूरी है। व्यापारी महासंघ के अध्यक्ष कैलाश नारायण गोयल ने कहा कि 32 और 26 रुपये कमाने वाला व्यक्ति अमीर कैसे हो जाएगा। ऐसे में तो लगता है कि करोड़पति ही गरीब बन जायेगा। उन्होंने कहा कि इस तरह का मापन सामाजिक दृष्टिï से उचित नहीं है यह गरीबों के साथ अन्याय है।

दाल बाजार व्यापार समिति के अध्यक्ष महेन्द्र साहू कहते हैं कि जब पेट्रोल 72 रुपये, दाल 70 रुपये और सिलेण्डर 500 रुपये का हो ऐसी स्थिति में हजारों रुपये कमाने वाला भी गरीब है। उनका कहना है कि पांच हजार रुपये आय वाले व्यक्ति को गरीब माना जाए तब उचित होगा। 900 और 700 रुपये कमाने वाला तो बेहद गरीब होता है। ये तो गरीबी की तौहीन है…-

इन्दौर. केन्द्र सरकार द्वारा बीपीएल गरीबों की सीमा रेखा निर्धारित करने पर शहर में आम आदमी ने तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की.  सब्जी विक्रेता राजेश चौहान ने कहा कि आजकल एक बल्ब जलाने पर बिजली का खर्च ही 500-700 रुपए हो जाता है. जिस तरह महंगाई बढ़ रही है, उसके अनुसार तो 100 रुपए रोज कमाने वाला भी गरीबी रेखा के नीचे आना चाहिए.

हाथ ठेला चलाकर गुजर बसर करने वाले मदन प्रजापत का मत है कि सरकार बीपीएल के नाम पर जो झुनझुने बांटती हैं, उसे सीमित रखने के लिए यह रेखा तय की गई है. जिन लोगों ने ये सीमा तय की है उन्हें 32 रुपए रोज में कुछ दिन गुजारा करके बताना चाहिए, तब उन्हें अंदाजा होगा. किराना व्यवसायी हरि साधवानी ने कहा कि यह गरीबों के साथ मजाक है. आप 32 रुपए तो छोडि़ए, 50 या 100 रुपए में भी किसी भी हालत में 4-5 लोगों के परिवार को ढंग से खाना तक नहीं खिला सकते. दूसरी सुविधाओं की तो बात ही अलग है.

सड़क पर सब्जी की दुकान लगाने वाले प्रभातीलाल का कहना था कि जब हजारों रुपए रोज का भत्ता हमारे सांसदों को पूर नहीं पड़ता और वे उसे हर साल बढ़वा लेते हैं तो उन्हें गरीबी रेखा से क्या मतलब? उनके लिए तो 10 रुपए रोज कमाने वाला भी उनसे अमीर है.
ऐसी ही प्रतिक्रियाएं कई अन्य लोगों ने भी व्यक्त की, जिसमें आम आदमी से लेकर प्रबुद्धजन तक शामिल हैं.

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