पंडित नेहरू के प्रधानमंत्री काल के केन्द्रीय सिंचाई मंत्री डाक्टर के.एल. राव ने यह विचार दिया था और प्रथम नदी जोड़ योजना के रूप में उत्तर की गंगा को दक्षिण की कावेरी से जोडऩा था. कई वर्षों तक इसे ‘गंगा-कावेरी’ योजना का ही नाम दिया. इस पर कई सर्वे, अनुमान, सेमीनार, बैठकें हुईं. उसी संदर्भ में यह विचार भी आया कि देश की दूसरी नदियों को भी जोड़ा जाए. इन योजनाओं के पक्ष व विरोध में भी कई तकनीकी तर्क रखे गये. लेकिन यह पाया कि इसमें खर्च और समय इतना लगेगा कि उसके अनुपात में इनसे उतना लाभ नहीं होगा. बीच में ऐसा आभास भी हुआ कि इन योजनाओं को हमेशा के लिये त्याग दिया गया है.
मध्यप्रदेश शासन को यह श्रेय अवश्य ही दिया जाना चाहिए कि बजाय इन पर बातें ही करते रहने से कुछ काम करके देखा जाए. मध्यप्रदेश नदी जोड़ योजना में देश में पहला प्रयोग बुंदेलखंड क्षेत्र में केन और बेतवा नदी को जोडऩे का कर रहा है. इस योजना पर प्राथमिकता से काम चल रहा है.

एक प्रयोग हो जायेगा तो मध्यप्रदेश देश के सामने एक उदाहरण पेश कर देगा और उसमें जमीनी वास्तविकता में यह अध्ययन सामने आ जायेगा कि इस पर खर्चा कितना आया है, क्या-क्या परेशानियां और उनका निदान कैसे होता है और सबसे ऊपर जानना होगा कि इनके जोडऩे से सिंचाई बाढ़ नियंत्रण, जल भंडारण,और जल विस्तार में कितना लाभ मिला.
यदि इसमें उन्नति और विकास नजर आता है तो अन्य नदियों में इस प्रयोग को पूरे भरोसे के साथ बढ़ाया जा सकता है. मध्यप्रदेश में चंबल क्षेत्र की कई नदियों को आपस में जोडऩे की योजनाएं तैयार की जा चुकी हैं. इन पर तकनीकी रिपोर्ट आ चुकी है. प्रश्न केवल फंड और संसाधन जुटाने और काम शुरू करने का है. केन-बेतवा प्रयोग मध्यप्रदेश को इस दिशा में निर्णायक कदम उठाने लायक बना देगा.

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