पाकिस्तान में इस समय नागरिक सत्ता और सेना के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है. स्थिति विस्फोटक हो गई और किसी भी समय बड़े परिवर्तन के संकेत मिलने लगे हैं. पाकिस्तान की मजबूरी यह है कि वह बिना अमेरिका की आर्थिक व सैन्य मदद के चल नहीं सकता. अमेरिका भी अफगान युद्ध के कारण पाकिस्तान को पूरी तौर पर छोड़ नहीं सकता. ओसामा बिन लादेन को एकतरफा अमेरिकी कार्यवाही में मारे जाने के बाद से वहां आम लोगों में अमेरिका के प्रति द्रोह की भावना पैदा हो गई है. इस समय चीन भी पाकिस्तान की मजबूरी का फायदा उठाते हुए उसे अपने प्रभाव व प्रभुत्व में लाने के प्रयास कर रहा है.
ओसामा की मौत के बाद राष्टपति श्री आसिफ अली जरदारी को यह खतरा महसूस होने लगा था कि सेना व आई.एस.आई. पाकिस्तान में जरदारी-गिलानी सरकार का तखता पलट सकते हैं और उन्होंने अमेरिकी सेनाओं की संयुक्त समिति के अध्यक्ष एडमिरल मुलेन से सरकार को बचाने के लिए पाक सेना की संभावित कार्यवाही के विरुद्ध मदद मांगी थी. हालांकि श्री जरदारी ने इस आरोप से इंकार किया है लेकिन पाकिस्तान में कोई भी इस सफाई पर विश्वास नहीं कर रहा है, न ही सारे विश्व में इस बात पर कोई भरोसा कर रहा है. पाकिस्तान की सत्ता व सेना को ओसामा के बारे में कुछ भी पता नहीं था. हाल ही में पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख जनरल जियाउद्दीन बट ने कहा कि पाकिस्तान की सेना व आई.एस.आई. ने ओबामा को छिपाया था और इसकी जानकारी जनरल कियानी व फौजी राष्टपति जनरल परवेज मुशर्रफ को थी. भूतपूर्व फौजी शासकों के विरुद्ध हुए जन आंदोलन को देखते हुए इस समय फौज सीधे तौर पर सत्ता पर नहीं आना चाहती लेकिन वह वर्तमान जरदारी-गिलानी सरकार को अपनी पकड़ में रखना चाहती है. बात इतनी बिगड़ गई है कि प्रधानमंत्री श्री गिलानी खुलकर सेना की भत्र्सना करने लगे. उन्होंने कहा है कि ”सेना देश के भीतर स्वाधीन सत्ता की तरह काम करे यह मंजूर नहीं किया जा सकता.” उन्होंने सेना पर ये सवाल भी उठाए कि 6 साल लादेन पाकिस्तान में रहा और उसे भनक तक नहीं लगी.

श्री गिलानी सेना प्रमुख जनरल कियानी और आई.एस.आई. प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शुजा पाशा से बेहद नाराज है और उन्हें जल्द से जल्द हटाना चाहते हैं. पिछले महीने नाटो फौजों के ड्रोन हमलों में कई पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे. इस संबंध में राष्टपति जरदारी व प्रधानमंत्री श्री गिलानी का यह मानना है कि इन फौजी जनरलों ने अमेरिका के विरुद्ध बहुत ज्यादा कठोर रवैया अपनाया. इससे दोनों देशों के संबंध काफी खराब हो गए हैं. अमेरिकी कांग्रेस ने भी रुष्ट होकर पाकिस्तान को आर्थिक व सैन्य मदद पर रोक लगा दी है. नागरिक सत्ता यह मान रही है कि सेना व आई.एस.आई. दोनों बिना सत्ता हथियाये देश में अपनी सत्ता कायम कर रहे हैं.  पाकिस्तान और अमेरिका दोनों सरकारें यह चाहती हैं कि ड्रोन हमले को एक दुर्घटना मानकर खत्म किया जाए और उनके संबंध पहले जैसे ही बने रहें. साथ ही पाकिस्तान नाटो को अफगान चलाने में पहले जैसी सहायता देता रहे. अमेरिका ने संकेत दिया है कि वह उस हालत में आर्थिक सहायता जारी रख सकता है लेकिन सेना ड्रोन हमले को बराबर तूल देकर जनता को सत्ता व अमेरिका के विरुद्ध भड़काते रखना चाहती है जिससे नागरिक सत्ता स्वयं ही असफल हो जाए और वे जन सहयोग से बिना तख्ता पलटे सत्ता में आ जाएं.

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