! ओबामा के रुख से रिश्तों में खटास !

दिल्ली. कभी व्हाईट हाउस में मनमोहन सिंह को अपना पहला राजकीय मेहमान बनाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा क्या मनमोहन के प्रति बेरुखी रख रहे हैं? और इसके पीछे भी क्या ‘अन्ना-फैक्टर’ है? प्रधानमंत्री की अमेरिकी यात्रा से कुछ इसी तरह के संकेत मिल रहे हैं.

                                                          मनमोहन सिंह 22 से 25 सितंबर तक अमेरिका में ही हैं. वे संयुक्त राष्ट्र महासभा में शिरकत करेंगे और 24 को उनका सम्बोधन भी होगा. चार दिन रहने के बावजूद यह आश्चर्य का विषय है कि अमेरिका ने इस बात में कोई रुचि नहीं दर्शाई कि ओबामा और मनमोहन सिंह की मुलाकात संभव हो सके. ओबामा की यात्रा पर पलक पावड़े बिछाने वाले भारत को यह नागवार लग रहा है. इस तरह के सवाल उठ रहे हैं कि भारत और अमेरिका की दोस्ती में कोई खटास आ रही है? और क्या इसके पीछे ‘अन्ना फैक्टर’ है?

पिछले दिनों अन्ना आंदोलन और पुन: परोक्ष रूप से ओबामा द्वारा अन्ना की याद करना-इस कड़ी को मजबूत कर रहा है. अन्ना हजारे के आंदोलन के पूर्व अमेरिका द्वारा भारत को एक तरह से उचित व्यवहार की नसीहत दी गई थी. इसकी व्यापक आलोचना भी हुई थी. अमेरिका को यह टीस चुभ-सी रही है. मनमोहन से मुलाकात संभव न होने के संदर्भ में इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता है कि ओबामा ने संयुक्त राष्ट महासंघ की बैठक में मध्यपूर्व एशिया और अरब देशों में बदलाव की बयार का उल्लेख करते हुये कहा कि दुनियाभर में अब भी ऐसे लोग हैं जो शांतिपूर्ण जीवन में विश्वास रखते हैं.

बिना अन्ना का नाम लिये वे यहां तक कह गये कि भारत सहित दुनिया के कई देशों में ‘आजादी और बदलाव की मांग की जा रही है. दिल्ली से लेकर वर्सावा तक प्रदर्शनकारी अहिंसक तरीके से आंदोलन कर रहे हैं. कूटनीतिक गलियारों में इस प्रसंग पर ओबामा के इस बयान के अर्थ खोजे जा रहे हैं. उधर, बुधवार सुबह न्यूयॉर्क रवानगी से पहले दिए संदेश में मनमोहन सिंह ने कहा कि इस यात्रा के दौरान ईरान के अलावा श्रीलंका व दक्षिणी सूडान के राष्ट्रपति और नेपाल व जापान के प्रधानमंत्रियों से भी उनकी मुलाकात अपेक्षित है.

प्रधानमंत्री ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक ऐसे मौके पर हो रही है जब पश्चिम एशिया, उत्तरी अफ्रीका और खाड़ी क्षेत्र बड़े उतार-चढ़ाव से गुजर रहा है और काफी अनिश्चय की स्थिति है. फलस्तीन का सवाल भी अभी तक तय नहीं है.
उन्होंने दुनिया के लिए इस नाजुक दौर में संयुक्त राष्ट्र जैसी निष्पक्ष और स्वीकार्य संस्था को मजबूत बनाने के लिए काफी समय से लंबित सुधार प्रक्रिया की रफ्तार बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने विश्व शांति के लिए चुनौती बन रही आतंकवाद, समुद्री डकैती जैसी समस्याओं के मुकाबले के लिए संयुक्त राष्ट्र के परचम तले अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की वकालत की.

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