एसोचेम द्वारा कार्यशाला आयोजित

भोपाल,30 मई,नभासं.किसान-कल्याण तथा कृषि विकास मंत्री डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया ने कहा है कि प्रदेश में जैविक खेती की अनेक संभावनाएँ हैं. राज्य की अर्थ-व्यवस्था के समग्र विकास में कृषि के महत्व को प्रतिपादित करने के लिए मध्यप्रदेश शासन ने अनेक कदम उठाये हैं.

जैविक खेती की शुरूआत सदियों पुरानी हैं. वर्तमान में प्रदेश में 21 हजार किसान जैविक खेती कर रहे हैं. जैविक खेती को अपनाने के लिए हमें पूरे मन से प्रयास करना होगा. डॉ. कुसमरिया एसोचेम द्वारा आयोजित कार्यशाला में बोल रहे थे. डॉ. कुसमरिया ने कहा कि दिनों-दिन हो रहे रासायनिक खाद के उपयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति कम हो रही है. ऐसी स्थिति में हमें जैविक खेती पद्धति अपनाना होगी. बदलते परिवेश में गौ-पालन कम हो गया है,
वातावरण भी प्रदूषित होकर मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है. इसके हमें रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों के उपयोग के स्थान पर जैविक खादों से उत्पादित खाद्य पदार्थों को अपनाना होगा. इससे भूमि, जल और वातावरण शुद्ध रहेगा और मनुष्य एवं प्रत्येक जीवधारी स्वस्थ रहेंगे.

एसोचेम की म.प्र., छत्तीसगढ़ तथा उड़ीसा की टास्क फोर्स के सह अध्यक्ष  अनिल अग्रवाल ने रसायनों, हाईब्रीड बीज तथा जेनेटिकली सर्टिफाइड बीजों से होने वाली खेती से खेती की जमीन तथा मानव स्वास्थ्य पर पडऩे वाले असर की ओर ध्यान आकर्षित किया. उन्होंने बताया कि प्रकृति, विविधता तथा स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए जैविक खेती का पूरी दुनिया में विस्तार हो रहा है. श्री अग्रवाल ने आशा व्यक्त की कि एसोचेम द्वारा जैविक खेती पर आयोजित इस सम्मेलन से मध्यप्रदेश के किसान लाभान्वित होंगे. बायोसर्ट इंडिया, इंदौर के प्रबंध संचालक दिलीप धाकड़ ने कार्यशाला में बताया कि जैविक खेती में मध्यप्रदेश अग्रणी है. देश का लगभग 600 करोड़ रुपये के जैविक उत्पादों के निर्यात का 50 प्रतिशत मध्यप्रदेश में होता है.

अभी भारत से जैविक उत्पादों में प्रमुखत: खाद्यान्न, दाल, कपास, शक्कर, मसाले तथा सोयाबीन का निर्यात होता है.  इंटरनेशनल कांपीटेंस सेंटर फॉर आर्गेनिक एग्रीकल्चर बोर्ड के सदस्य मुकेश वर्मा ने बताया कि भारत में पाँच लाख किसान जैविक खेती के लिए पंजीकृत हैं.  यूनियन ने 2020 से केवल जैविक खेती के उत्पादन और आयात की घोषणा की है.

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