जुलाई में प्रस्तावित राष्ट्रपति चुनाव के लिये चल रही सर्वसम्मत प्रत्याशी की तलाश के  प्रयास अब जोर पकड़ते जा रहे हैं. राष्ट्रीय स्तर पर इस दिशा में की जा रही कोशिशें बीते दो-तीन दिनों से आकार लेती दिखाई दे रही हैं. यह तय दिख रहा है कि कांग्रेस और यूपीए घटकदलों में जिन नामों को लेकर चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं, सर्वानुमति बनने पर उन्हें ही राष्ट्रपति पद के लिये केन्डिडेट बनाया जायेगा.

 

बहरहाल, इस सिलसिले में अब तक हुई चर्चाओं से जो दो नाम उभर कर सामने आये हैं, उनमें धाकड़ राजनेता और देश के वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी का नाम सर्वतोप्रमुख है. उनके अलावा उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी का नाम भी यूपीए के ही एक वर्ग की ओर से आगे किया जा रहा है. ऐसा करने वालों का तर्क है कि देश में अनेक बार उप-राष्ट्रपति को ही राष्ट्रपति बनाये जाने की एक परंपरा सी रही है. फिर उप-राष्ट्रपति के रूप में श्री अंसारी ने अपनी भूमिका का गरिमामय ढंग से निर्वाह भी किया है. इसलिये उन्हें भी राष्ट्रपति चुनाव के लिये  यूपीए घटक दलों का सर्वसम्मत प्रत्याशी बनाया जा सकता है. इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के अलावा जिन अन्य दलों की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है, उनमें तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, द्रविड़ मुनेत्र कषगम और बहुजन समाज पार्टी प्रमुख हैं. इन्हीं पार्टियों के नेता एक-दूसरे से कानाफूसी करते नजर आ रहे हैं. चर्चाओं में ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव ने एक राय के संकेत भी दिये हैं. यह भी साफ दिखाई दे रहा है कि यदि कांग्रेस प्रणव बाबू के नाम को आगे बढ़ाती है तो उसे ममता बनर्जी के साथ ही बंगाली फैक्टर के कारण वामदलों की भी रजामंदी मिल सकती है.

वहीं उत्तरप्रदेश चुनावों में मिली जोरदार जीत के बाद मुलायम सिंह यादव ने भी यह कहकर प्रणव मुखर्जी के नाम पर अपनी सहमति का इशारा कर दिया है कि राष्ट्रपति बनने वाले शख्स का अनुभवी राजनीतिज्ञ होना बेहद जरूरी है. वैसे  भी मुलायम सिंह की पार्टी पहले ही यूपीए सरकार को बाहर से अपना समर्थन भी दे रही है. इसलिये सपा के कांग्रेस द्वारा प्रस्तावित प्रत्याशी से बाहर जाने की गुंजाईश कम ही है. इसी तरह वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को इस पद के लिये यूपीए का प्रत्याशी बनाने में भी अपनी दिक्कतें हैं. एक तो श्री मुखर्जी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली कांग्रेस नीत गठबंधन वाली केन्द्र सरकार के लिये लगातार संकटमोचक की भूमिका निभाते रहे हैं. वे अब तक तीन-चार बार इस भूमिका का प्रमाण भी दे चुके हैं. लेकिन, राष्ट्रपति बनने के बाद एेसा कुछ कर पाना श्री मुखर्जी के लिये असंभव होगा. वहीं राष्ट्रपति बनने के बारे में उन्होंने खुद अपनी राय भी जाहिर नहीं की है कि वे खुद क्या चाहते हैं. जहां तक गैर राजनीतिक शख्सियत को राष्ट्रपति बनाये जाने का सवाल है? कांग्रेस डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को रिपीट नहीं करना चाहती. उनके भाजपा कनेक्शन से यूपीए गठबंधन के कुछ और दलों को भी एतराज हो सकता है. ऐसे में ले-देकर फिर एक नाम श्री प्रणव बाबू का ही उभरता है. पर यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने यह कहकर एेसी अटकलों पर विराम लगाने की कोशिश की है कि राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी का नाम समय आने पर तय किया जायेगा. लेकिन, उनके एेसा कहने मात्र से इस चुनाव को लेकर सियासी बिसात बिछा चुके नेता अपने मोहरे समेट लेंगे, यह सोचना गलत होगा.

यूपीए गठबंधन के कुछ लोग तो अभी से इस लॉबिंग में भी जुट चुके हैं कि यदि कांग्रेस हामिद अंसारी को राष्ट्रपति पद के लिये प्रत्याशी बनाती है तो उप-राष्ट्रपति पद पर अपनी पसंद के शख्स को किस तरह बिठाया जा सकेगा. लेकिन, श्री अंसारी मूल रूप से वाम दलों की पसंद रहे हैं. उप-राष्ट्रपति पद के लिये उनके नाम का प्रस्ताव भी लेफ्ट की ओर से ही आया था. संभवत: यही वो वजह है जो श्री अंसारी को राष्ट्रपति पद के लिये कांग्रेस की पहली और इकलौती पसंद बनाने की राह में रोड़े खड़े कर रही है. बहरहाल, पूरा मामला अभी भविष्य की गर्त में है. लेकिन, मौजूदा तनाव भरे सियासी माहौल के बावजूद यदि देश में राष्ट्रपति का चुनाव सर्वानुमति से संभव हो जाता है तो इसे हमारी खुशकिस्मती ही कहा जायेगा.
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