लोकसभा में लोकपाल बिल पेश, जोरदार बहस

नई दिल्ली, 22 दिसंबर, नससे. लोकपाल पर अन्ना के मंच से उनको समर्थन देने वाली कई विपक्षी पार्टियों ने बिल लोकसभा के पटल पर रखे जाते ही पाला बदल कर विरोध करना शुरू कर दिया है.

इनका कहना है कि किसी व्यक्ति या गुट के दबाव में ऐसा बिल न लाया जाए जिससे संसद की ताकत कम होती हो. इन्होंने हड़बड़ी में बिल पेश करने और पास करने का विरोध किया. अन्ना हजारे के आंदोलन को ज्यादा महत्व देने का विरोध करने वालों में सबसे आगे आरजेडी के लालू यादव, एसपी के मुलायम, सीपीएम के गुरुदास दास गुप्ता, शिवसेना के अनंत गीते और एमआईएम के ओवैसी रहे.  बिल का विरोध मोटे तौर पर 4 वजहों से किया जा रहा है. अल्पसंख्यक आरक्षण, राज्यों के लिए लोकायुक्त को अनिवार्य करने की व्यवस्था, पीएम को लोकपाल के दायरे में लाया जाना और लोकपाल को ज्यादा ताकतवर बनाना. लालू प्रसाद यादव ने लोकपाल के तहत प्रधानमंत्री को लाए जाने का विरोध किया है. लालू ने कहा कि देश रौब से चलता है, आंदोलन से नहीं. एसपी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने लोकपाल बिल का विरोध किया. मुलायम ने कहा कि इस बात की क्या गारंटी है कि लोकपाल सरकार को ब्लैकमेल नहीं करेगा. मगर, सदन के नेता प्रणव मुखर्जी ने कहा कि बिल की वैधानिकता कोर्ट के विवेक पर निर्भर करती है. उन्होंने कहा कि इस वक्त बिल की वैधानिकता का सवाल उठाना ठीक नहीं है.

उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग सरकार को इस मसले पर हड़बड़ी न करने की सलाह दे रहे हैं, उनमें कई ऐसे हैं जो अन्ना हजारे के मंच पर जाकर वहां उन्हें समर्थन देने का एलान कर रहे थे. बाद में सदन ने ध्वनि मत से बिल को पेश करने की इजाजत दे दी. टीम अन्ना ने इस लोकपाल बिल को जनविरोधी और खतरनाक बताया है. टीम अन्ना ने कहा कि इसका मकसद जनअधिकारों को कुचलना है. टीम अन्ना इस बिल को वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि इसके ड्राफ्ट में सुधार किया जाए.

लोकपाल में आरक्षण को लेकर हंगामा

आज सुबह जैसे ही लोकपाल बिल पेश किया गया इसके बाद हंगामा का दौर शुरू हो गया. लालू यादव, मुलायम सिंह यादव सहित कई नेताओं ने यह मांग की  लोकपाल में अल्पसंख्यकों के लिए कोटा होना चाहिए. अल्पसंख्यकों की मांग को देखते हुए तीन बार सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी. राजद नेता लालू यादव ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी व राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के आगे घुटने टेक दिए है और अल्पसंख्यक कोटा के प्रावधानों को हटा दिया है. इस पर मीरा कुमार ने लालू से कहा कि वह विधेयक में से कुछ न न पढ़ें क्योंकि यह अभी पेश नहंी किया गया है. सपा सदस्य भी इसी मांग को लेकर आसन के समक्ष आ गए. आल इंडिया मजलिस ए इत्तहादुल मुसलमीन के असादुद्दीन औवेसी भी अपने स्थान पर खड़े होकर कुछ कहते सुने गए लेकिन हंगामे में उनकी बात सुनी नहीं जा सकी.

सरकार ने नए लोकपाल विधेयक से लोकपाल की पीठ में और सर्च कमेटी में 50 प्रतिशत आरक्षण के संबंध में अल्पसंख्यक शब्द को हटा दिया है, वहीं सीबीआई के अभियोजन और जाच को भी अलग नहीं करने का फैसला किया है. 64 पन्नों के संशोधित लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक, 2011 में प्रस्ताव रखा गया है कि लोकपाल तथा लोकायुक्तों के 50 प्रतिशत सदस्य अनुसूचित जाति-जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और महिला समुदाय से होंगे, लेकिन इसमें अल्पसंख्यक शब्द का कोई जिक्र नहीं किया गया है. इसी तरह की स्थिति लोकपाल की सर्च कमेटी के लिए भी है. संसद सदस्यों को गुरुवार को वितरित किए गए लोकपाल विधेयक के मसौदे में यह प्रस्ताव भी दिया गया है कि सीबीआई निदेशक का चयन प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के प्रधान न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश की तीन सदस्यीय समिति करेगी. इसमें सीबीआई को लोकपाल के नियंत्रण से पूरी तरह बाहर रखा गया है. हालांकि लोकपाल में सीबीआई को उसके द्वारा भेजे गए भ्रष्टाचार के मामलों में एजेंसी पर निगरानी का प्रावधान है.

लोकपाल में कुछ एहतियातों के साथ प्रधानमंत्री को इसके दायरे में रखा गया है इनमें अंतरराष्ट्रीय संबंधों, आतरिक और बाह्य सुरक्षा, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष आदि मामलों में प्रधानमंत्री को छूट का प्रावधान है. लोकपाल के प्रमुख और उसके सदस्यों का चयन प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष, भारत के प्रधान न्यायाधीश और राष्ट्रपति द्वारा नामित किसी प्रतिष्ठित न्यायविद की समिति करेगी. राज्यों में लोकायुक्तों के मामले में चयन समिति में मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, विपक्ष के नेता, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या कोई न्यायाधीश और राज्यपाल द्वारा नामित कोई न्यायविद होंगे. विधेयक में मंत्रियों, सासदों, मुख्यमंत्रियों, विधायकों के साथ सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों से संबंधित शिकायतों को प्राप्त करने और उनमें जाच करने के लिए प्रभावी प्रणाली स्थापित करने का प्रस्ताव है. लोकपाल और लोकायुक्त को संवैधानिक दर्जा प्राप्त होगा जिसके लिए सरकार द्वारा अलग से संविधान संशोधन [116] लाया जाना है. लोकपाल और लोकायुक्त दोनों ही संस्थाओं में एक अध्यक्ष होगा और अधिकतम आठ सदस्य होंगे. इनमें 50 प्रतिशत न्यायिक पृष्ठभूमि से होंगे. विधेयक में स्पष्ट किया गया है कि लोकपाल तथा लोकायुक्त जिन मामलों में जांच कर रहे हैं या उनके निर्देश पर जो जाच शुरू की गई हैं, उनमें अभियोजन चलाने के लिए पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं होगी. इसी तरह लोकपाल द्वारा सीबीआई को सौंपे गए मामलों में भी जाच के लिए पूर्व अनुमति जरूरी नहीं होगी.

लोकपाल और लोकायुक्त के अधीन ए, बी, सी और डी सभी श्रेणी के सरकारी कर्मचारियों को रखा गया है. समूह ए और बी के अधिकारियों के संबंध में शिकायतों पर प्राथमिक जाच करने के बाद सीवीसी कार्रवाई के लिए वापस लोकपाल को भेजेगा, वहीं समूह सी और डी के कर्मचारियों के संदर्भ में सीवीसी स्वयं कार्रवाई करेगा. विधेयक में प्रारंभिक जाच के लिए लोकपाल तथा लोकायुक्तों का एक जाच प्रकोष्ठ गठित करने के साथ एक स्वतंत्र अभियोजन प्रकोष्ठ बनाने का भी प्रावधान है. तीन सदस्यीय एक समिति जाच रिपोर्ट पर विचार करेगी और वह फैसला कर सकती है कि जाच की सिफारिश की जाए, अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जाए या मामले को बंद कर दिया जाए. प्रधानमंत्री के खिलाफ शिकायतों के मामले में विधेयक में कहा गया है कि उनके खिलाफ प्राथमिक जाच या जाच शुरू करने का फैसला लोकपाल की पूर्ण पीठ को ही लेना होगा, जिसमें तीन चौथाई का बहुमत हो. यह प्रक्रिया बंद कमरे में [गोपनीय]होगी.

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