नई दिल्ली, 9 अगस्त. मॉनसून सत्र के पहले दिन बुधवार को लोकसभा में बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के एक विवादास्पद बयान पर जमकर हंगामा हुआ. खुद यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस बयान के विरोध की अगुवाई की. सोनिया गांधी पहली बार इस तरह गुस्से में दिखीं. हंगामे को देखते हुए आडवाणी ने अपना बयान वापस ले लिया, लेकिन सोनिया ने जता दिया कि अब वे विपक्ष के हमलों का उसी के अंदाज में जवाब देने के लिए तैयार हैं.

दरअसल, मॉनसून सत्र के पहले दिन बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने असम की हिंसा को लेकर स्थगन प्रस्ताव पेश करते हुए एक ऐसा विवादास्पद बयान दिया जिससे सोनिया गांधी हत्थे से उखड़ गईं. हरी साड़ी में लाल-पीली सोनिया का ये रूप देखकर विपक्ष तो विपक्ष कांग्रेसी भी चौंक गए. आमतौर पर सोनिया को संसद में मंद-मंद मुस्कराते ही देखा गया था. लेकिन इस बार तो सेनापति ने खुद कमान संभाल ली. ऐसे में सैनिकों के पास युद्ध के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था. कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि सोनिया अगर गुस्से में थीं तो ये गुस्सा स्वाभाविक था. जिस तरह का बयान आडवाणी का था उससे कोई भी गुस्सा हो जाता.

इस बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी आडवाणी के बयान को शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण बताया है. हंगामे को देखते हुए आडवाणी ने अपना बयान वापस ले लिया. लेकिन माफी की बात दरकिनार कर दी. बहरहाल, दो बजे के बाद सदन की कार्यवाही फिर शुरू हो गई. लेकिन सोनिया गांधी की मुद्रा ने उनकी छवि को नया रंग दिया है. उन्होंने बता दिया है कि उनके चुपचाप रहने या संकोच में डूबे दिखने से किसी को भ्रम नहीं होना चाहिए. जरूरत पडऩे पर वे विपक्ष के कद्दावर नेताओं से खुद दो-दो हाथ कर सकती हैं.

भाजपा ने सोनिया को याद दिलाई मर्यादा

नई दिल्ली. संसद में संप्रग अध्यक्ष के आक्रामक व्यवहार पर भाजपा ने आरोप लगाया कि सोनिया ने अपने सदस्यों को शोरशराबे के लिए उकसाकर गलत नेतृत्व दिया है. भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने कहा,  जब मांझी ही नाव डुबाएगा तो कांग्रेस को कौन बचा सकता है.

प्रधानमंत्री के बयान पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, आडवाणी के बयान को अशोभनीय करार देने वाले प्रधानमंत्री को 2जी और राष्ट्रमंडल जैसे घोटाले में शामिल कांग्रेसी सदस्यों के व्यवहार पर कोई अफसोस नहीं है. शाहनवाज ने माना कि आडवाणी के बयान में थोड़ी चूक हो गई थी, जिसे उन्होंने वापस भी ले लिया. लेकिन, सोनिया ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी जिसमें सदन की कार्यवाही चलना मुश्किल था. वह अपने सदस्यों को शांत करने के बजाय उन्हें आगे आने के निर्देश दे रही थीं जो आपत्तिजनक है. उन्होंने नेतृत्व की गलत परंपरा दी है. शाहनवाज ने कहा कि प्रधानमंत्री आदत के अनुसार संसद में चुप रहते हैं, लेकिन बाहर बोलते हैं. जबकि, संसदीय कार्यमंत्री का व्यवहार नेता की बजाय छोटे कार्यकर्ता की तरह होता है जो सदन चलाने के बजाय उसे बाधित करने में जुटे रहते हैं.

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