प्रशांत महासागर का एक समुद्री भाग दक्षिण चीन सागर और इसके कारण पूरा प्रशांत महासागर इन दिनों विश्व राजनीति में बड़ा अशांत बना हुआ है. चीन की झगड़ालू प्रवृति में उसका हमेशा अन्य देशों से विवाद चलता ही रहता है. इन दिनों वह दक्षिण चीन सागर पर केवल अपना प्रभुत्व ही चाहता है. जबकि इस सागर की तटवर्ती परिधि में वियतनाम व दक्षिण पूर्व के कई राष्ट्र आते हैं. अंतर्राष्ट्रीय कानून में किसी देश की समुद्री सीमा उसके तट से 12 नोटीकल मील मानी गई है. उसके आगे अंतरराष्टï्रीय समुद्र माना जाता है. इस पर किसी राष्ट्र का हक नहीं होता है और सभी राष्ट्र उसका उपयोग करने को स्वतंत्र हैं. केवल नाम से कोई समुद्र किसी राष्ट्र का नहीं हो सकता. पूरा हिन्द महासागर भारत का और पूरा अरब सागर अरब राष्ट्रों का नहीं है. मुंबई का पश्चिमी भाग अरब सागर पर है. विश्व के भूगोल में कई समुद्र देशों के नाम हैं. प्रशांत महासागर में ही दक्षिण चीन सागर के अलावा जापान सागर, पूर्वी चीन सागर, फिलीपींस सागर, सेबिल्स सागर, बंडा सागर, तिमोर सागर व जावा सागर है.

विवादित दक्षिण चीन सागर के तटों पर फिलीपींस, मलेशिया, वियतनाम व सिंगापुर राष्ट्र हैं. जबसे भारत की तेल कंपनी ओ.एन.जी.सी. ने वियतनाम के तट पर पेट्रो तेल की खोज का काम शुरू किया है. चीन उस सागर पर अपना प्रभुत्व बता रहा है. भारत ने चीन की आपत्ति को खारिज करते हुये वहां अपना तेल खुदाई का काम जारी रखा हुआ है. चीन इन दिनों अपनी सैनिक शक्ति भी अपनी जरूरत से ज्यादा बढ़ा रहा है और दक्षिण चीन सागर के साथ पूरे प्रशांत महासागर को अपने प्रभाव में रखना चाहता है. अपने आस्ट्रेलिया व आसियान के दौरे के समय अमेरिकी राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा ने चीन को चेतावनी दी थी कि प्रशांत महासागर क्षेत्र में अमेरिका के अलावा अन्य सभी देशों के हित हैं और वहां चीन का प्रभुत्व नहीं जमने दिया जायेगा. अमेरिका प्रशांत में अपनी सैनिक शक्ति को और अधिक बढ़ायेगा.

चीन की प्रशांत हरकतबाजी पर वाशिंगटन में 19 दिसंबर को भारत, अमेरिका और जापान के बीच त्रिपक्षीय वार्ता दौर शुरू हुआ. इसमें इस बात पर विचार हो रहा है कि दक्षिण चीन सागर, चीन की दादागिरी से कैसे निपटा जाये. जहां भारत की तरह जापान और अमेरिका के हित समान हैं. तीनों देशों ने यह तय किया है कि वे दक्षिण चीन सागर पर केवल चीन के एकाधिकार को स्वीकार नहीं करते. वाशिंगटन वार्ता के बाद जापान के प्रधानमंत्री श्री योशिहिको नोदा का 27 से 29 दिसंबर तक भारत का अहम् दौरा होगा. वाशिंगटन शिखर वार्ता के बाद भारत यात्रा में भारत व जापान के प्रधानमंत्री आपसी सामरिक साझेदारी को मजबूत करने के लिये वार्तायें व अहम फैसले करेंगे. भारत-जापान वार्ताओं में रक्षा सहयोग पर जोर रहेगा. इसमें साझा नौसैनिक अभ्यास, सेना प्रमुखों के एक दूसरे देश में दौरे शामिल होंगे. इन दिनों चीन के कारण प्रशांत में राजनैतिक तनाव की स्थिति निर्मित हो रही है.

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