भोपाल गैस त्रासदी की 27वीं बरसी पर भुक्तभोगी पहली बार हिंसक व उग्र हो गये और नतीजन उन पर पुलिस की लाठियां बरस गर्ईं. इस दिन राजधानी भोपाल की सड़कों पर हवा से भारी मिथाइल आइसोसाइनाइड गैस जमीन से सटकर फैली थी और सोते हुए हजारों लोगो को दम घोटकर मार डाला. लाखों आज भी उसके दुष्प्रभाव को भोग रहे हैं. इसे विश्व की सबसे बड़ी रासायनिक दुर्घटना माना गया है, जिससे हजारों मानव, पशु-पक्षी व पेड़-पौधे तक जल और मर गये थे.

इसकी हर बरसी हर साल बड़ी गंभीरता से मनाई जाती रही. सर्व धर्म प्रार्थना सभाएं व शोक उद्गार मृतकों की याद में व्यक्त किये जाते थे. लेकिन सिर्फ इसी साल इस बरसी पर गंभीरता और गमगीनी बिल्कुल गायब रही और हिंसक प्रदर्शन, पथराव, आगजनी, आंसू गैस, लाठी चार्ज और हवाई फायर का रूप सामने आ गया. ऐसा कतई नहीं होता था. अमेरिका में वल्र्ड ट्रेड सेंटर के दो टावरों पर आतंकी हमला हुआ, हजारों मारे गये. उसके बाद अमेरिका के समुद्री तट पर मेक्सिको खाड़ी से तेल का भारी रिसाव हुआ. पूरा समुद्र प्रदूषित हो गया. कुछ ही महीनों में इनके मामलों में मुआवजा लेना व बांटने का काम संपन्न हो गया. लेकिन भोपाल गैस त्रासदी का मामला 27 साल में ही अभी पूरे समाधान तक नहीं पहुंचा है.

भोपाल की त्रासदी का समाधान केंद्र सरकार के हाथों में है. वहां से अजीबो गरीब टुकड़ों में बेतुके समाधान आ रहे है. कभी 200 रुपया प्रतिमाह अंतरिम सहायता दी गई जो रकम कुछ नहीं के बराबर थी. इसके मुकदमे चलते रहे. फिर एकाएक सभी मुकदमों पर कार्यवाही रोक 25 हजार रुपयों का प्रोराटा मुआवजा दे दिया और इसमें से पिछली अंतरिम सहायता की रकम काट ली. अब केवल 42 हजार लोगों को केंद्रीय मंत्री मंडल ने वर्गीकृत कर कुछ लाख रुपयों का मुआवजा मृतकों के परिवार या गंभीर रूप से पीडि़त व्यक्तियों को दिया गया. राज्य सरकार यह कह रही है कि पूरे भोपाल को गैस पीडि़त माना जाए. पर केंद्र कुछ वार्डों को मानता है. सुप्रीम कोर्ट में पुराने फैसले में संशोधन के रूप में कार्बाइड या उसको खरीदने वाली कंपनी ‘डाऊ’ से और मुआवजे की मांग की गई है. सरकार को इस मामले को समग्र रूप से जल्दी से जल्दी निपटाकर खत्म
करना चाहिए.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
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