मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने 66वें स्वाधीनता दिवस पर राज्य में प्रगति सोपानों को रेखांकित किया. वहीं इस अवसर पर राज्य शासन ने राज्य के शासकीय कर्मचारियों को भत्तों में वृद्धि की सौगात भी दी. लेकिन कर्मचारी वर्ग इससे न सिर्फ असन्तुष्टï हैं बल्कि ठगा महसूस कर रहा है.

नौकरियां तो वेतन से चलती हैं और भत्ते वेतन के साथ होते हैं. सरकार ने भत्ते तो दिये लेकिन ग्रेड-वेतन विसंगति पर ध्यान नहीं दिया गया. सबसे उपेक्षित शासकीय दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी उपेक्षित ही बना रहा. जबकि दिग्विजय सिंह की कांग्रेस सरकार द्वारा दैनिक वेतनभोगियों को हटाने पर भारतीय जनता पार्टी ने उसे राजनैतिक चुनावी मुद्दा भी बनाया था कि उनकी बहाली व संरक्षण होगा. मुख्यमंत्री ने केंद्रीय आकलन का हवाला देते हुए बताया कि देश में राज्य की आर्थिक विकास दर सर्वाधिक 12 प्रतिशत रही. हमारी प्रगति दर इतिहास में अभूतपूर्व और देश में सर्वाधिक 18 प्रतिशत रही. केंद्र ने खेती की विकास दर 4 प्रतिशत रखी थी जबकि मध्यप्रदेश ने 9 प्रतिशत कृषि विकास दर हासिल की है. उनके शासनकाल में अब तक 4 हजार मेगावाट विद्युत क्षमता से विकास हुआ.

इस साल बिना ब्याज कृषि ऋण साढ़े आठ करोड़ रुपये का दिया जायेगा. गेहूं की तरह धान पर भी समर्थन मूल्य खरीदी पर 100 रुपयों का बोनस दिया जायेगा. ग्राम पंचायतों को 19 सौ करोड़ रुपये की राशि दी जा रही है. शहरों में पेयजल योजनाओं के लिए 132 करोड़ रुपयों की व्यवस्था की गई है. मुख्यमंत्री ने अपनी प्रिय लाडली लक्ष्मी योजना का जिक्र करते हुए बताया कि अभी तक 13 लाख से अधिक बेटियों को इस योजना के तहत लखपति बनाया जा चुका है. तेंदूपत्ता संग्राहकों की मजदूरी भी 650 रुपये से बढ़ाकर 750 रुपये प्रति बोरा कर दी गई है.

लेकिन मात्र भत्तों को बढ़ा देने से कर्मचारी वर्ग बजाय उत्साही होने के निराश हो गया. अग्रवाल वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने की घोषणा से लगभग सभी कर्मचारी संगठन क्रोधित हैं. वे इसके खिलाफ प्रदर्शन व पूर्ण विरोध के लिये लामबंद हो रहे हैं. वेतन आयोग ने किसी भी कर्मचारी संगठन को सुनवाई के लिये नहीं बुलाया. आयोग का तर्क भी बड़ा ही बेतुका है कि कर्मचारी संगठनों के मेमोरेन्डम इतने ज्यादा थे कि किसी को नहीं बुलाने का निर्णय लिया. ऐेसे अवसरों पर कर्मचारी संगठन मेमोरेन्डम ही देते हैं. इसके अलावा फिर हड़ताल, प्रदर्शन आदि ही होते हैं. यदि लोगों को सुना ही नहीं जायेगा तो फिर यही और इससे ज्यादा भी कुछ होगा. दैनिक वेतनभोगी जो सब सुविधाओं से वंचित केवल वेतन पर ही रहता है उसे इस बार तिरस्कृत किया गया है. उसे तो कुछ भी नहीं मिला.

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