सारणी क्षेत्र में करोड़ों रुपयों की लागत से बने राजडोह पुल के टुकड़े हो गए ‘कोई यहां गिरा-कोई वहां गिरा.’ पूरे क्षेत्र में अलर्ट घोषित हो गया. कितना अच्छा होता यदि शासन-प्रशासन उस समय अलर्ट रहता जब यह पुल बन रहा था तो आज यह नौबत और तबाही नहीं आती. पुल तो पानी में बहा लेकिन इसके साथ करोड़ों रुपये भी पानी में डूब गए. क्या इसके लिए वर्षा जिम्मेवार है? क्या यह कहा जाए कि यह न होती तो अच्छा था. अभी पूरी वर्षा हुई भी नहीं है. भादों का महीना शुरु हुआ है.

भारत में सावन-भादों भारी वर्षा के माह माने जाते हैं. गांव डूब गए, बांध लबालब भर गए तो उनमें पानी छोड़कर नदियों की बाढ़ में ही और बाढ़ लायी जा रही है. हर सड़क डूबी हुई है, हर बस्ती व घरों में पानी भर गया. यह पूरी दुर्दशा नगरीय, ग्रामीण व सड़क योजनाओं की खामियां है. जब सड़कों के नीचे से पानी निकलने के रास्ते नहीं हैं तो पानी ऊपर से बहेगा और इससे सड़क भी बह जायेगी. बस्तियों में जल निकासी नहीं है तो घरों में ही तालाब-स्वीमिंग पूल बनेंगे.

इस समय राज्य में वर्षा का कहर नहीं है. अभी इस पूरे भादों महीने में भारी वर्षा होना है. हो सकता है कि इससे ही वर्षा का सामान्य औसत पूरा हो जाए. लेकिन हमारी व्यवस्था की दुर्दशा को देखते हुए तो यह अवïश्यंभावी लगता है. सामान्य स्तर तक वर्षा होने तक राज्य के सभी शहर, गांव व सड़कें असामान्य हो जायेंगी. वर्षाकाल के बाद खुशहाली के माहौल के बजाय बरबादी का मंजर नजर आयेगा. वर्षा तो कभी भी आफत नहीं होती- अभी भी नहीं है. मुसीबत हमने खुद ही बनाई है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
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