जोशीला और मातमी बना रहेगा माहौल

भोपाल, 5 दिसम्बर, नभासं. मैदाने-करबला में इस्लाम के प्रवर्तक और अपने नाना पैगम्बर हजरत मोहम्मद (सल.) के कौल का मान रखते हुऐ दीन की हिफाजत के जज्बे के साथ अपने परिजनों और साथियों सहित शहादत देकर इस्लामी तवारीख में अजीम मर्तबा व रूतबा हासिल करने वाले शहीदाने-करबला हजरत इमाम हुसैन और उनके सहयोगियों की याद में ताजियेदारी की परम्परा का निर्वाह 6 दिसम्बर को चांद की दस तारीख के उपलक्ष्य में अकीदत और जोशो-खरोश के साथ किया जाएगा.

अलम निशानों की अगुवाई में निकलने वाले ताजियों के जुलूस के दौरान बड़े और छोटे इमामबाड़ों सहित मुस्लिम पंचायतों के ठिकानों से लेकर जुलूस के मार्गों से सम्बन्धित क्षेत्र का वातावरण मातमी धुनों के बीच ढोल-ताशों की जोशीली गूंजों और नारों से लरजता-गरजता प्रतीत होगा वहीं समूचा मुस्लिम समाज परम्पराओं के तहत सड़कों पर जनसैलाब उमड़ता दिखाई देगा, जो इससे पूर्व 5 दिसम्बर की रात्रि कत्ल की रात की परम्पराओं के निर्वाह में संलग्न्र रहकर ताजियों की पारम्परिक गश्त में भागीदारी करने में जुटे रहते हुए आज ताजियेदारी की परम्परा का निर्वाह हमेशा की तरह जोशीली अकीदत के साथ करेगा. गौरतलब है कि इस्लामिक कैलेण्डर के पहले महीने मोहर्रम की शुरूआत के साथ इस्लाम की सबसे बड़ी जंग और शहादत को लेकर मुस्लिम समाज पिछले कई दिनों से ताजियेदारी की तैयारियों में जुटा हुआ था जो आज मंगलवार को अपनी अकीदत का इजहार पूरी शिद्दत के साथ करेगा. इस मौके पर सोमवार की रात हर साल की तरह गश्त के लिए निकले व कतार में रखे गए सभी ताजियों को मातमी लेकिन जोश भरे माहौल में अलसुबह अपने-अपने ठिकानों पर वापस ले जाए जाने के बाद अपराह्र पूर्व जुलूसों के रूप में अलम निशानों के साथ लाया जाएगा, जहां अखाड़ों के हैरतअंगेज प्रदर्शनों और खलीफाओं की दस्तारबंदी के बाद ताजियों का जुलूस करबला घाट की ओर रवाना होगा, जहां ताजियों को अकीदत के साथ विसर्जित कर दिया जाएगा. इस मातमी त्यौहार की समाप्ति चहल्लुम के साथ चालीसवें दिन होगी.

कत्ल की रात हुई ताजियों की गश्त- ताजियों के जुलूस से पूर्व सोमवार को कत्ल की रात के उपलक्ष्य में सभी ताजिए गश्त पर निकले और बड़े इमामबाड़े सहित ताजियों के ठिकानों का माहौल देर रात तक ढोल-ताशों से गूंजता रहा. उल्लेखनीय है कि मोहर्रम माह के चांद की नौ तारीख मुस्लिम समाज में कत्ल की रात के रूप में मान्य की जाती रही है. इस दिन समूचा समुदाय बड़े इमामबाड़े सहित अखाड़ों के प्रदर्शन के बीच ताजियों को जन-दर्शनार्थ रखा जाता है. इस बार भी ताजियों के दीदार और मनौतियों के लिए उमडऩे वालों की भीड़ के बीच जोश और अकीदत का मिला-जुला माहौल रात भर जारी रहा जो आज चांद की दस तारीख को ताजियों के जुलूस के दौरान लगातार ऊंचाइयों की ओर अग्रसर होते हुए शाम तक अपने शबाब पर पहुंच जाएगा तथा मध्यरात्रि पूर्व सम्पन्न होगा.

प्रशासन व पुलिस प्रशासन मुस्तैद – अलम निशानों के जुलूस से लेकर कत्ल की रात तक जोशो-खरोश के बीच रोमांचक बने हालातों के बाद मोहर्रम के त्यौहार के दौरान उमडऩे वाली भीड़ के बीच कानून-व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने के लिए पुलिस और प्रशासन सहित शांति समिति के सदस्य पूरी तरह से तैयार हैं. ताजियों के जुलूस में प्रयुक्त सभी उप-मार्गों से लेकर जुलूस के मुख्य मार्ग तक साफ-सफाई और प्रकाश के वैकल्पिक प्रबंधों सहित आवारा पशुओं व अस्थायी अतिक्रमणों पर नियंत्रण और पेयजल की उपलब्धता के इन्तजाम किए गए हैं.

हैरतअंगेज होंगे लाग कला के प्रदर्शन- मोहर्रम के परम्परागत जुलूस के मौके पर जहां कलात्मक ताजियों और अखाड़ों के साथ ढोल-ताशे और झांझ बजाते लोग हजारों लोगों की भीड़ के आकर्षण का केन्द्र बनेंगे वहीं हैरत में डालने वाली कला के कलाकारों पर सभी की निगाहें होंगी जो अपने प्रदर्शन से लोगों के दिल दहलाते हुए सभी को अचरज में डालने का काम करेंगे. शरीर के विभिन्न हिस्सों में धारदार शस्त्रों और तीरों को आर-पार निकालने और चाकू-छुरे जैसे हथियार संवेदनशील अंगों में घुसाकर सड़कों पर उतरने वाले दर्जनों युवा कलाकारों को देखकर जहां सभी आश्चर्यचकित होकर दांतों तले उंगलियां दबाते नजर आऐंगे वहीं इन करतबों के पीछे की कला को लेकर भी कौतुहल व रोमांच का माहौल बना रहेगा. गौरतलब है कि मोहर्रम के जुलूस के मौके पर सिर में छुरा, हाथ-पैरों में तीर, गर्दन में तलवार, जीभ में चाकू फंसाए जुलूस की शक्ल में सड़क पर आने वाले लाग कलाकारों को देखकर जहां भीड़ में शामिल लोगों के  कलेजे दहल उठते हैं वहीं मातमी त्यौहार के जोशो-खरोश और रोमांच में और इजाफा प्रतीत होता है. प्रतिवर्ष मोहर्रम के मौके पर आयोजित परम्परागत अखाड़ों और ताजियों के जुलूस के दौरान लाग कला का प्रदर्शन करने वाले कलाकारों को जहां समाज की ओर से नगद पुरूस्कार देते हुए पुरूस्कृत किया जाता है वहीं उनके प्रदर्शन की सराहना आम जनता द्वारा भी की जाती है. हालांकि अब इस बेहद पुरानी कला के कलाकार कम रह गए हैं लेकिन विभिन्न अखाड़ों से सम्बन्धित कुछ कलाकार आज भी ऐसे हैं जो इस कला को जीवंत बनाए हुए हैं तथा समय-समय पर उनका प्रदर्शन करते हुए जनमानस में कौतुहल जगाने का काम करते आ रहे हैं.

यहां से पहुंचेंगे करबला- प्रात: 9.30 बजे नगर निगम कॉलोनी काजी कैंप इमामबाड़े मिशन काफला-ए-हुसैनी के जुलूस निकाले जायेंगे और स्टेशन स्थित ईरानी इमामबाड़े से सुबह 9 बजे जुलूस अलम-ए-मुबारक निकाला जायेगा. उक्त दोनों जुलूस दोपहर 12 बजे भोपाल टॉकीज चौराहे पर मिलेंगे जहां बड़ी तकरीर होगी. अम्मू खां की बगिया से भी जुलूस अलम-ए-मुबारक निकाला जायेगा. पीरगेट पर भी तकरीर होगी. ये सभी जुलूस 3 बजे कदीमी करबला पहुंचेंगे जहां अलविदाई मजलिस के बाद जुलूस समाप्त होगा. मजलिस-ए-सोयम 10 दिसंबर को करबला मैदान पर रात 9 बजे होगी जिसमें बेंगलूर के मौलाना एस.एम. तूसी साहब बयान करेंगे.

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