नई दिल्ली, 8 फरवरी. देश के वन्यजीव प्रेमियों के लिए अच्छी खबर है कि 2011 के दौरान बाघों के शिकार में 2010 की तुलना में 60 फीसदी की कमी दर्ज की गई.

बाघों के संरक्षण में लगे एक गैर सरकारी संगठन ने कहा कि अब भी बाघों पर खतरा बरकरार है. ‘वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसायटी ऑफ इंडिया’ (डब्ल्यूपीएसआई) के अनुसार 2010 के 30 की तुलना में 2011 में 13 बाघों का शिकार हुआ. इस प्रकार शिकार की घटनाओं में 57 फीसदी की कमी 2011 में दर्ज की गई. जबकि सड़क दुर्घटना, अन्य पशुओं से संघर्ष, विद्युत स्पर्शघात सहित अन्य कारणों से 2011 में 61 बाघ मरे. 2010 में यह आंकड़ा 58 था. डब्ल्यूपीएसआई के अनुसार 21 बाघों की प्राकृतिक मौत हुई. डब्ल्यूपीएसआई के टीटो जोसेफ ने बताया, ‘2010 की तुलना में 2011 में निश्चित तौर पर शिकार की घटनाओं में कमी दर्ज की गई. लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि शिकार बंद हो गया.’

जोसेफ ने कहा कि शिकार में कमी बाघ प्राधिकरण द्वारा अन्य एजेंसियों के साथ मिलकर गश्ती की प्रभावी रणनीति अपनाने के कारण सम्भव हुआ. वन्यजीवों का अवैध व्यापार बाघों के अस्तित्व के सामने बड़ा खतरा है. जोसेफ ने कहा कि व्यापारी बाघ के अंगों के लिए बड़ी राशि अदा करते हैं. उन्होंने कहा, ‘हाल ही में वियतनाम एवं कम्बोडिया में इसके व्यापार की जानकारी मिली है. खतरा केवल चीन से ही नहीं है, दक्षिण पूर्व के देशों से भी है.’ कॉर्बेट नेशनल पार्क के यू.सी. तिवारी ने कहा, ‘वन्यजीवों के अंगों के विशेष बाजार हैं और इनकी कीमतें जल्दी नीचे नहीं आती.’, तिवारी ने कहा कि शिकार के आंकड़ों में केवल वही मामले दर्ज होते हैं जो सामने आते हैं और यह शायद वास्तविक परिस्थितियों को बयां नहीं करते. एक अधिकारी ने बताया, ‘कई शिकारियों के जेल में होने के कारण यह कमी आई है.’ इस तथ्य से सहमति जताते हुए वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष अशोक कुमार ने कहा, ‘हमारे अधिवक्ताओं ने न्यायालय में उनके खिलाफ लड़ाई लड़ी ताकि वे जेल से बाहर न आ सकें.’ मार्च 2011 में जारी आंकड़ों के अनुसार देश में बाघों की संख्या लगभग 1700 है.

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