क्रिसमस पर घर-घर और प्रत्येक चर्च में सजने वाला क्रिसमस ट्री आज पूरे विश्व में मशहूर हो चला है. रंगबिरंगी सजावटों से, रोशनियों, गिफ्ट्स से सजा-धजा यह क्रिसमस ट्री अपना अद्भुत आकर्षण पेश करता है. हर एक व्यक्ति इसके सौंदर्य में आप ही खो जाता है. रोशनी से नहाया हुआ क्रिसमस ट्री अपनी खूबसूरती की अनोखी छटा बिखेरता है जिसे देखकर मन में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो जाता है.

सदियों से सदाबहार वृक्ष फर या उसकी डाल को क्रिसमस ट्री के रूप में सजाने की परंपरा चली आ रही है. प्राचीनकाल में रोमनवासी फर के वृक्ष को अपने मंदिर सजाने के लिए उपयोग करते थे. लेकिन जीसस को मानने वाले लोग इसे ईश्वर के साथ अनंत जीवन के प्रतीक के रूप में सजाते हैं. हालांकि इस परंपरा की शुरुआत की एकदम सही-सही जानकारी नहीं मिलती है.

माना जाता है कि क्रिसमस ट्री सजाने की परंपरा की शुरुआत हजारों साल पहले उत्तरी यूरोप से हुई. पहले के समय में क्रिसमस ट्री गमले में रखने की जगह घर की सीलिंग से लटकाए जाते थे। फर के अलावा लोग चैरी के वृक्ष को भी क्रिसमस ट्री के रूप में सजाते थे. अगर लोग क्रिसमस ट्री को लेने में सक्षम नहीं होते थे तब वे लकड़ी के पिरामिड को एप्पल और अन्य सजावटों से इस प्रकार सजाते थे कि यह क्रिसमस ट्री की तरह लगे क्योंकि क्रिसमस ट्री का आकार भी पिरामिड के जैसा ही होता है. इसके अलावा क्रिसमस ट्री की उत्पत्ति को लेकर कई किवदंतियां हैं. ऐसा माना जाता है कि संत बोनिफेस इंग्लैंड को छोड़कर जर्मनी चले गए. जहां उनका उद्देश्य जर्मन लोगों को ईसा मसीह का संदेश सुनाना था. इस दौरान उन्होंने पाया कि कुछ लोग ईश्वर को संतुष्ट करने हेतु ओक वृक्ष के नीचे एक छोटे बालक की बलि दे रहे थे. गुस्से में आकर संत बोनिफेस ने वह ओक वृक्ष कटवा डाला और उसकी जगह फर का नया पौधा लगवाया जिसे संत बोनिफेस ने प्रभु यीशु मसीह के जन्म का प्रतीक माना और उनके अनुयायिओं ने उस पौधे को मोमबत्तियों से सजाया. तभी से क्रिसमस पर क्रिसमस ट्री सजाने की परंपरा चली आ रही है.

इसके अलावा इससे जुड़ी एक और कहानी मशहूर है वह यह कि एक बार क्रिसमस पूर्व की संध्या में कड़ाके की ठंड में एक छोटा बालक घूमते हुए खो जाता है. ठंड से बचने के लिए वह आसरे की तलाश करता है तभी उसको एक झोपड़ी दिखाई देती है. उस झोपड़ी में एक लकड़हारा अपने परिवार के साथ आग ताप रहा होता है. लड़का इस उम्मीद के साथ दरवाजा खटखटाता है कि उसे यहां आसरा मिल जाएगा. लकड़हारा दरवाजा खोलता है और उस बालक को वहां खड़ा पाता है. उस बालक को ठंड में ठिठुरता देख लकड़हारा उसे अंदर बुला लेता है. उसकी बीवी उस बज्चे की सेवा करती है। उसे नहला कर, खाना खिलाकर अपने सबसे छोटे बेटे के साथ उसे सुला देती है. क्रिसमस की सुबह लकड़हारे और उसके परिवार की नींद स्वर्गदूतों की गायन मंडली के स्वर से खुलती है और वे देखते हैं कि वह छोटा बालक यीशु मसीह के रूप में बदल गया है. यीशु बाहर जाते हैं और फर वृक्ष की एक डाल तोड़कर उस परिवार को धन्यवाद कहते हुए देते हैं. तभी से इस रात की याद में प्रत्येक मसीह परिवार अपने घर में क्रिसमस ट्री सजाता है. आज जिस तरह मसीह समुदाय के लोग घर में क्रिसमस ट्री सजाते हैं उसका श्रेय जर्मनी के मार्टिन लूथर को जाता है. कहा जाता है क्रिसमस की पूर्व संध्या में मार्टिन लूथर यूं ही बाहर घूम रहे थे और आकाश में चमकते सितारों को देख रहे थे. जो फर के वृक्षों की डालियों में से बहुत ही सुंदर दिखाई दे रहे थे. घर आकर उन्होंने यह बात अपने परिवार को बताई और कहा कि इस तारे ने मुझे प्रभु यीशु मसीह के जन्म को स्मरण कराया। इसके लिए वे एक फर वृक्ष की डाल घर में लेकर आए और उसे मोमबत्तियों से सजाया। ताकि उनका परिवार उनके इस अनुभव को महसूस कर सके. अत: घर के अंदर क्रिसमस ट्री सजाने की परंपरा की शुरूआत मार्टिन लूथर के द्वारा ही मानी जाती है.  कहा जाता है कि क्रिसमस और न्यू ईयर के सेलिब्रेशन में सदाबहार वृक्ष का उपयोग पहली बार लत्विया की राजधानी रिगा के टाउन स्क्वेयर में किया गया.

1605 में जर्मनी में पहली बार क्रिसमस ट्री को कागज के गुलाबों, सेब और केन्डीस से सजाया गया. पहले के समय में क्रिसमस ट्री के टॉप पर बालक यीशु का स्टेज्यू रखा जाता था. जिसका स्थान बाद में उस एंजल के स्टेज्यू ने ले लिया जिसने गरडिय़ों को यीशु मसीह के जन्म के बारे में बताया था. कुछ समय बाद क्रिसमस ट्री के टॉप पर सितारे को रखा जाने लगा जिसने ज्योतिषियों को यीशु का पता बताया था. आज भी क्रिसमस ट्री के टॉप पर सितारा रखा जाता है. क्रिसमस ट्री के साथ-साथ ही सारे मसीह परिवार और चर्च में इस तारे को विशेष तौर पर लगाया जाता है. यूनाइटेड स्टेट में क्रिसमस ट्री के रिवाज की शुरुआत आजादी की लड़ाई के दौरान हुई और इसका श्रेय हैसेन ट्रूप्स को दिया जाता है. ब्रिटेन में क्रिसमस ट्री सजाने की शुरुआत सन 1830 में मानी जाती है. सन् 1841 में जब क्वीन विक्टोरिया के पति प्रिंस अल्बर्ट ने विन्डसर महल में क्रिसमस ट्री को सजाया, तब से क्रिसमस ट्री ब्रिटेन में बहुत लोकप्रिय हो गया और क्रिसमस सेलिब्रेशन का अहम हिस्सा बन गया. क्वीन विक्टोरिया के समय में क्रिसमस ट्री को कैंडल्स से सजाया जाता था और यह कैंडल्स तारे को दर्शाती थीं. आज भी यूरोप के कई हिस्सों में क्रिसमस ट्री सजाने के लिए कैंडल्स का प्रमुखता से उपयोग किया जाता है.

सन् 1885 में शिकागो का एक अस्पताल क्रिसमस ट्री की मोमबत्तियों द्वारा आग की चपेट में आ गया था. आग की इस वजह को खत्म करने के लिए रेल्फ मॉरिस ने 1895 में बिजली से जलने वाली क्रिसमस लाइट का आविष्कार किया जिनका रूप आज की लाइट्स से काफी मिलता-जुलता था. इस तरह रेल्फ मॉरिस ने क्रिसमस को सुरक्षित बनाया और कैंडल्स द्वारा आग की संभावनाओं को कम किया. क्रिसमस ट्री के तीन पॉइंट परमेश्वर के त्रियेक रूप पिता़, पुत्र और पवित्र आत्मा को दर्शाते हैं. धीरे-धीरे क्रिसमस ट्री की सजावटों के नए-नए पैमाने बनते चले गए और आज क्रिसमस ट्री को हम रंगबिरंगी रोशनियों, सितारों, घंटियों, उपहारों, चॉकलेट्स से सजा-धजा पाते हैं.

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