वाशिंगटन, 6 अगस्त. मंगल पर जीवन की तलाश में निकला अमेरिकी स्पेस रिसर्च एजेंसी नासा का क्यूरियोसिटी रोवर अपने नियत स्थान पर उतर गया। भारतीय समय के मुताबिक ठीक 11 बजकर 1 मिनट पर क्यूरियोसिटी रोवर ने मंगल ग्रह पर लैंड किया।

टीवी खबरों के मुताबिक अबतक के सबसे बड़े पैराशूट की मदद से क्यूरियोसिटी रोवर को मंगल ग्रह पर उतारा गया। 26 नवंबर 2011 को अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने फ्लोरिडा के केप कैनावेरल से ‘क्यूरियोसिटी’ को भेजा गया था। 253 दिन (करीब 8 महीने) तक बिना रुके यात्रा करने के बाद क्यूरियोसिटी रोवर मंगल ग्रह पर उतरा। मार्स क्यूरियोसिटी रोवर की रफ्तार प्रति घंटे करीब 21 हजार किलोमीटर रही, जो आवाज की रफ्तार से 17 गुना ज्यादा है। इन 253 दिनों में क्यूरियोसिटी रोवर ने करीब 5.7 करोड़ किलोमीटर का सफर तय किया है। क्यूरियोसिटी रोवर की लैंडिंग को लेकर नासा के वैज्ञानिकों में खासी टेंशन थी, लेकिन सफल लैंडिंग के बाद उनके खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

इस मिशन के लिए नासा के वैज्ञानिक 10 साल से मेहनत कर रहे थे। साथ ही इस मिशन पर 130 अरब रुपए खर्च हुए हैं। छह पहियों वाले क्यूरियोसिटी का वजन 900 किलो और ऊंचाई 3 मीटर है। यह रोवर मंगल पर दो साल काम करेगा। इस दौरान कम से कम 19 किलोमीटर की दूरी तय करेगा। रोवर मंगल पर रेडियोआइसोटॉप जेनरेटर से मिलने वाली बिजली से चलेगा। ईंधन के रूप में प्लूटोनियम-238 का इस्तेमाल होगा।

दहशत के वो सात मिनट
क्यूरियोसिटी रोवर के लैंडिंग के सात मिनट वैज्ञानिकों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण रहे। मार्स साइंस लेबोरेट्री ने इन सात मिनटों को दहशत के सात मिनट करार दिया था। मिशन की सफलता या विफलता इन्हीं सात मिनट पर थी। यान के मंगल पर उतरने के बाद इससे भेजे गए सिग्नल पृथ्वी तक आने में भी सात मिनट का समय लगा। नासा ने यूरोपीयन स्पेस एजेंसी (ईएसए) से भी संपर्क किया है।

ईएसए से लैंडिंग की निगरानी करने और तस्वीरें जुटाने का आग्रह किया गया था। लैंडिंग के दौरान यान में मौजूद कंप्यूटर इसकी हर गतिविधि पर नजर रखेगा और इसको नियंत्रित भी किया। वहीं, मंगल का वायुमंडल यान की रफ्तार कम करने में मदद की। मंगल का वायुमंडल पृथ्वी के वायुमंडल की तुलना में 100 गुना कम सघन है। इसकी वजह से रफ्तार भी धीरे-धीरे कम होती रही।

भारत का मंगल मिशन

भारत सरकार की मंजूरी के बाद स्पेस एजेंसी इसरो नवंबर 2013 में एक मार्स ऑर्बिटर लॉन्च करेगा। 450 करोड़ रुपये के इस मिशन में एक सैटलाइट मंगल की सतह के 100 किलोमीटर ऊपर चक्कर काटता रहेगा। इस तरह यह भविष्य के मंगल अभियानों के लिए जरूरी आंकड़े, नक्शे और जानकारियां जुटाएगा।

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