भारत का औद्योगिक उत्पादन घटकर गत जून माह में 1.8 प्रतिशत की रिकार्ड गिरावट पर आ गया. कोई भी उद्योग यह क्यों चाहेगा कि उसका उत्पादन घटे. इस दयनीय स्थिति पर भूतपूर्व वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी और वर्तमान वित्तमंत्री श्री चिदम्बरम दोनों ने ही निराशा जताई है.

लेकिन इस स्थिति के लिये सरकार स्वयं जिम्मेवार है. उद्योग और व्यापार पर ही सबसे ज्यादा टैक्स भार बना हुआ है. देश के भीतर रिजर्व बैंक बैंक दरें लगातार 13 बार तक बढ़ाता और अभी भी दो बार कुछ कम करने के बाद फिर उन्हें यथावत स्थिति में रखे हुए है. दूसरी ओर वैश्विक स्थिति में भारत का रुपया डालर के मुकाबले लगातार गिरता जा रहा है. इससे उद्योग जगत जो अपनी जरूरत का आयात करता है वह महंगा हो गया और इसी कारण हम जो निर्यात करते हैं वह आयात करने वालों के लिये महंगा हो जाता है. रुपये के मूल्य में गिरावट से उद्योग जगत अपनी वस्तुओं का मूल्य स्थिर नहीं रख पाता और उसकी अन्तरराष्टï्रीय बाजारों में ग्राहकी बिगड़ जाती है. सरकार सिर्फ निराशा जताने और वैश्विक संकट को बहाने के रूप में पेश कर बैठ जाती है. ऐसे में भारी औद्योगिक उत्पादन घटकर नीचे आ रहा है तो उद्योग जगत खुद असहाय बन गया.

हर बार यह संकेत तो दिया जाता है कि रिजर्व बैंक दरें घटाकर पून्जी सस्ती करेगा लेकिन वह होता नहीं है. वह बढ़ती मुद्रास्फीति की आड़ में अपनी विवशता जता देता है.
इस समय भारत का उद्योग चार बड़ी बातों का संकट झेल रहा है. 1) घटती मांग 2) बढ़ती ब्याज दरें 3) उच्च मुद्रास्फीति और इन सबसे ऊपर 4) केन्द्रीय सरकार की नीतियां व निष्क्रियता. सरकार वित्तीय घाटे के नाम पर सब्सिडी घटाती जा रही है. उद्योग जगत को जहां वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सब्सिडी मिलनी चाहिए वहां उसे मिलती नहीं है और उसकी कार्य पूंजी तक महंगी ब्याज दरों और घटते व्यापार के कारण कम होती जाती है.
इस समय खनन क्षेत्र में गिरावट 1.1, मेन्यूफेक्चरिंग में 0.7 विद्युत में 6.4 और कुल मिलाकर 1.8 प्रतिशत आ चुकी है.

देश में निवेश की स्थिति दिनोंदिन बिगड़ती जा रही है. रुपया का मूल्य गिरने से विदेशी निवेशकों ने अपनी पूंजी वापस निकाल ली और देशी निवेशकों ने सोना में निवेश करना शुरू कर दिया. इससे उद्योग जगत में पूंजी का संकट पैदा हो गया. न सिर्फ औद्योगिक उत्पादन क्षेत्र में बल्कि रिटेल बाजार तक पर इस बात का बहुत ही बुरा असर पड़ा है कि आम उपभोक्ता की महंगाई के कारण क्रय शक्ति काफी कम हो गयी है. अब वह खुद अभाव की स्थिति में अपने को लाकर तकलीफ झेलने के लिये मजबूर है. बाजार का अंतिम और निर्णायक स्तर रिटेल का उपभोक्ता ही होता है.

घरेलू उत्पाद भी पिछले 9 सालों से सबसे ज्यादा घटकर 5.3 प्रतिशत पर आ गया. देश की विकास दर भी 6.5 प्रतिशत के अनुमान से घटकर 5.5 प्रतिशत तक आ जाने की आशंका वास्तविकता में आ चुकी है. अर्थव्यवस्था में जबरदस्त सुस्ती आ जाने से देशी व वैश्विक वित्त संस्थाओं का भरोसा नहीं जम रहा है.  इस व्यापक आर्थिक संकट में भ्रष्टï राजनेताओं व शासकीय अधिकारी व मामूली कर्मचारियों के यहां करोड़ों-अरबों की पूंजी बरामद हो रही है. अर्थ-व्यवस्था घट रही है, केवल भ्रष्टïाचार बढ़ रहा है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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