हाथों में हथकड़ी के साथ वाघा सीमा पहुंचे सुरजीत, परिजन हर्षित

अटारी, 28 जून. भारतीय कैदी सुरजीत सिंह को भले ही गुरुवार सुबह पाकिस्तानी जेल से रिहाई मिल गई हो लेकिन जब वह वाघा सीमा पर पहुंचे तो उनके हाथों में हथकड़ी थी. उनकी हथकड़ी लोहे की एक जंजीर के जरिए पाकिस्तानी पुलिस अधिकारी के बेल्ट से जुड़ी हुई थी.

सुरजीत सिंह ने स्वीकार किया कि वह पाकिस्तान में भारत के जासूस थे. भारत आते ही उन्होंने कहा मैं भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ का एजेंट था लेकिन मेरी गिरफ्तारी के बाद किसी ने मेरी परवाह नहीं की. मुझसे ज्यादा मत पूछो वरना बीएसएफ के लोग गुस्सा हो जाएंगे. उनके ऐसा कहने के बाद ही सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी उन्हें कमरे में ले जाकर समझाने लगे. हालांकि पाकिस्तानी जेल में 30 साल बिताने के दौरान उन्होंने हमेशा खुद को जासूस बताये जाने का विरोध किया था. उन्हें पहले फांसी की सजा सुनाई गयी थी जो बाद में उम्रकैद में बदल दी गयी.

सफेद कुर्ता-पायजामा पहने और काले रंग की पगड़ी लगाए सुरजीत के साथ उनके दो बैग थे. वह पुलिस की गाड़ी से वाघा पहुंचे. जब वह गाड़ी से उतरे तो उनके हाथों में हथकड़ी थी. वह लाहौर की कोट लखपत जेल से रिहाई के एक घंटे बाद वाघा पहुंच गए थे.  सुरजीत ने उन्हें स्वदेश भेजे जाने की सारी औपचारिकताएं पूरी करने से पहले मुस्कुराते हुए अपने पाकिस्तानी वकील को गले लगाया. सुरजीत 30 साल से भी लम्बे समय से पाकिस्तानी जेल में कैद थे. उन्होंने वहां मौजूद पत्रकारों से पंजाबी में कहा कि मैं पाकिस्तान दोबारा कभी नहीं लौटूंगा.

उन्होंने कहा कि मुझे पहले जासूसी के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था. यदि मैं दोबारा लौटा तो सुरक्षा एजेंसियां मुझे दोबारा जासूसी के आरोप में गिरफ्तार कर सकती हैं. सुरजीत ने कहा कि दोनों देशों की सरकारों को भारत-पाकिस्तान सीमा के दोनों ओर के कैदियों को रिहा कर देना चाहिए. उन्होंने कहा कि जेल अधिकारियों का मेरे प्रति अच्छा व्यवहार था और मैं उनका शुक्रगुजार हूं. जब 69 वर्षीय सुरजीत जेल से बाहर आए तो वहां कई रिपोर्टर अपने कैमरे लिए साक्षात्कार के लिए उनका इंतजार कर रहे थे. वह 30 साल से भी लम्बी अवधि के बाद रिहा हुए हैं. सुरजीत ने कहा कि वह भारतीय पंजाब की अटारी सीमा में बेसब्री से उनका इंतजार कर रहे अपने परिवार से मिलने के लिए बेताब हैं. उनकी उम्रकैद की सजा 2005 में पूरी हो गई थी. पंजाब के फिरोजपुर सेक्टर में अंतर्राष्ट्रीय सीमा के नजदीक से वर्ष 1982 में सुरजीत के गायब होने के बाद से उनके परिवार ने उनसे दोबारा मुलाकात की उम्मीद छोड़ दी थी और उन्हें मृत मान लिया था. वर्ष 2005 में एक भारतीय कैदी की वापसी और उससे सुरजीत का लिखा एक पत्र मिलने के बाद उनके परिवार को उनकी वापसी की दोबारा उम्मीद बंधी थी.

सरबजीत के परिजनों का धरना

सरबजीत सिंह की रिहाई की बाट जोह रहा उनका परिवार गुरुवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना पर बैठा है. सरबजीत की रिहाई पर पाकिस्तान के पलटने से उनके परिजन आहत हैं. परिजनों का कहना है कि सरबजीत कि रिहाई को लेकर पाक ने भारत के साथ धोखा किया है. पाक में बम विस्फोट के आरोप में सरबजीत को मृत्युदंड सुनाया गया है. सरबजीत की रिहाई के लिए वर्षों से अभियान चला रही उनकी बहन दलबीर कौर ने कहा कि उनका परिवार जंतर-मंतर पर धरना देगा. प्रदर्शन के बाद सरबजीत के परिवार की कुछ राजनेताओं के साथ मुलाकात करने की भी योजना हैं.

बुधवार शाम को परिवार के साथ अन्य लोगों ने सरबजीत की रिहाई के लिए मोमबत्ती जुलूस निकाला. मंगलवार को खबर आई कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने सरबजीत के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया है और उसे जल्द रिहा कर दिया जाएगा. बाद में पाकिस्तानी राष्ट्रपति के प्रवक्ता फरहतुल्ला बाबर ने इन खबरों का खंडन कर दिया.

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